Thursday, June 07, 2007

हिन्दी काव्य साहित्य में ग्रीष्म ऋतु


ग्रीष्म का आतप बढ़ते ही चहल–पहल कम हो जाती है।वृक्षों के साथ हमारी निकटता बढ़ जाती है‚ वृक्ष हमें जीवनदाता से प्रतीत होने लगते हैं।लोग घरों में कैद होने लगते हैं। ऐसे में ग्रीष्म की अनुभूति का एक बड़ा हिस्सा तो पसीना बनकर ही निकल जाता है फिर भी कुछ रह जाता है जिसे कविताओं के माध्यम से अभिव्यक्त किया जाता रहा है।वसन्त और पावस की तुलना में ग्रीष्म पर कम कविताएँ लिखी गई हैं।ग्रीष्म की अभिव्यक्ति सभी प्रकार की कविताओं में मिलती है चाहे वे बाल कविताएँ हो या प्रौढ़ कविताएँ।अधिकांशतः ग्रीष्म से उत्पन्न सभी स्थितियों को प्रतीकों में प्रयुक्त किया है परन्तु अनेक कविताओं में अभिधा में भी इनका प्रयोग देखने को मिलता है।रीतिकाल में तो ऋतु वर्णन पर न जाने कितना श्रेष्ठ और विषद साहित्य लिखा गया है।आधुनिक साहित्य में भी ग्रीष्म पर केन्द्रित कविताएँ खूब लिखी जा रही हैं।कुछ कविताएँ जिनमें ग्रीष्म के विविध क्षणों की अनुभूति कवियों ने की है—
ग्रीष्म की धधकती धूप साधन सम्पन्न लोगों के लिए तो परेशानी की बात नहीं है क्योंकि उन्हें कौन सा धूप में निकलना है‚ घर बातानुकूलित बाहर जाने के लिए गाड़ी बातानुकूलित लेकिन गरीब रामू क्या करे अखबार नहीं बेचेगा तो भूखे पेट से क्या कहकर उसे समझाएगा—
धधकती धूप में रामू खड़ा है
बेचता अखबार जिसमें बड़े सौदे छप रहे हैं।
—रघुवीर सहाय

सूरज हमारी पृथ्वी पर जीवन बनाए रखने के लिए अनिवार्य है परन्तु उसका अतिशय ताप हमारे मन में झुँझलाहट ही पैदा करता है।डॉ0 रामदरश मिश्र की कविताओं में ग्रीष्म के सूर्य को कष्टों को प्रतीक बनाकर प्रस्तुत किया गया है—
किसने बैठा दिया है मेरे कंधे पर सूरज
एक जलता हुआ असह्य बोझ कब से ढो रहा हूँ

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मैं पिघलती धूप–सा फैलने लगता हूँ अनेक अंतरालों में।
—डॉ0 रामदरश मिश्र

ग्रीष्म की अनेक स्थितियाँ हमें जीवन की अन्य तल्ख सच्चाइयों को उकेरने की भाषायी शक्ति और ऊर्जा दे जाती हैं।हम अपनी मनःस्थितियों के लिए जब ग्रीष्मानुभूति का सहारा लेते हैं तो कविता प्रभावशाली हो जाती है—
कंठ प्यासा ओंठ सूखे
प्यास ही अपनी कहानी
रेत के सैलाब पाए
पर‚ न पाया बूँद पानी
प्यास की है रिक्त गागर‚ आस का जल–स्रोत गहरा
चिलचिलाती धूप है‚ और हम खड़े हैं बीच सहरा।
—आत्म प्रकाश नंदवानी ‘चक्रवर्ती’

यह सच है कि प्रत्येक व्यक्ति प्यासा है‚ कष्टों और चिन्ताओं की असहनीय घाम ने उसे व्याकुल कर दिया है।सिर पर जलती घाम‚ गहन बन‚ प्यास से व्याकुल हिरनी का दृश्य हमारे अन्दर करुणा या दया का भाव ही नहीं जगाते बल्कि इस दग्ध अनुभूति के भीतर हमें ले जाकर खड़ा कर देते हैं।सबकी अपनी–अपनी प्यास है अपनी–अपनी व्याकुलता है—
प्यासी हिरनी गहन वन‚ सिर पर जलती घाम।
भटके मेरी विकलता कब तक मेरे राम।।
भ्रमते हैं रवि शशि नखत‚ भरा गगन परिमाण।
अपनी–अपनी प्यास से‚ सबके व्याकुल प्राण।।
—डॉ0 रामसनेहीलाल शर्मा यायावर

जीवन का जब रास्ता लम्बा हो और कठिनाइयों के पड़ाव हों तो परेशानी तो होती ही है पर यह भी सच है कि कष्टों का सामना करने से ही व्यक्तित्व में निखार आता है।इस मायने में धूप हमारे जीवन की कुट सच्चाई है इसका आदर करना ही उचित होगा—
सूना लम्बा रास्ता‚ पग–पग रेत पहाड़।
तिल–तिल जलती धूप है‚ ऊँचे–ऊँचे ताड़।।
धूप नये तेवर लिये‚ आई मेरे द्वार।
मैंने सर माथे लिया‚ तेरा यह उपहार।।
—डॉ0 शैल रस्तोगी

हमारे जीवन में दुख और सुख आते जाते रहते हैं यही जीवन है‚ दुख के समय हम घबराएँ नहीं और सुख के समय अभिमानी न हो जाएँ इसलिए यह परिवर्तन होता रहता है।ग्रीष्म के आतप के उपरान्त तप्त व्योम के हृदय पर मेघों की माला सुशोभित हो जाती है।यह आशावादी दृष्टि ग्रीष्म का आतप हमें भी दे जाता है कि हम आशावादी रहें।महाप्राण निराला के शब्दों में—
जला है जीवन यह
आतप में दीर्घकाल
सूखी भूमि‚ सूखे तरु
सूखे सिक्त आल बाल
बन्द हुआ गुंज‚ धूलि
धूसर हो गए कुंज
किन्तु पड़ी व्योम–उर
बन्धु‚ नील मेघ–माल।
—सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला

बच्चों के लिए लिखी गई ग्रीष्म पर केन्द्रित कविताओं में गर्मी का अभिधेय अर्थ ही देखने को मिलता है।क्योंकि ये कविताएँ बालकों के मन की तरह सीधी‚ सरल‚ सहज और लयात्मक होती हैं जो ग्रीष्म का चित्र प्रस्तुत करती हैं—
कटते न लम्बे दिन काटे
जड़ती है गालों पर चाँटे
धरती पर दौड़ रही सरपट
गर्मी की धूप बड़ी नट–खट।
— — — —
फिर नभ से अंगारे बरसे
गर्मी के दिन आये हैं
मुश्किल हुआ निकलना घर से
गर्मी के दिन आये हैं ।
लम्बे–लम्बे ज्यों अजगर से
गर्मी के दिन आये हैं ।
—रामानुज त्रिपाठी

इसी प्रकार सूरज की भीषण गर्मी से व्याकुल एक बच्चा कितनी सहजता से अपनी स्वाभाविक भाषा में कह उठता है—
सूरज ने गर्मी फैलाई उइ दइया
काली पीली आँधी आई उइ दइया।।
सूरज की शक्ति का सही माने में आकलन ग्रीष्म में ही होता है‚ शीत ऋतु में तो बेचारा ठिठुरा‚ सिकुड़ा‚ प्रभाव हीन से नीलाकाश के कोने में दुबहा पड़ा रहता है।ग्रीष्म में वह नीलाकाश का सम्राट बन जाता है‚ उससे गर्मी कम करने की प्रार्थना कारने के सिवाय हम कर ही क्या सकते हैं।एक बच्चा गर्मी कम करने का निवेदन करते हुए कहता है—
सूरज दादा
सूरज दादा
थोड़ी गरमी कम कर दो
धरती जलने लगी तवे सी
थोड़ी गरमी कम कर दो
पशु–पक्षी हैं कितने व्याकुल
तुम तो स्वयं देखते हो
सूख गए हैं ताल–तलैया
थोड़ी गरमी कम कर दो
गरम–गरम लू दिन भर चलती
घर में कैद हो गए हम
मन करता है खेलूँ बाहर
थोड़ी गरमी कम कर दो

पिकनिक की जब बात करुँ
तो‚ मम्मी कहती‚ गरमी है
क्यों इतने नाराज हो गए
थोड़ी गरमी कम कर दो

क्या गलती हो गई? कि
दादाॐ ऐसे आँख दिखाते हो
कान पकड़ कर माँफी माँगू
थोड़ी गरमी कम कर दो
—डॉ0 जगदीश ‘व्योम’

ग्रीष्म ऋतु का सबसे गरम समय होता है जेठ का महीना।जेठ दोपहरी में लू चल रही है‚ मार्ग पर चलना मुश्किल हो रहा है‚ पैरों में फफोले पड़ जाते हैं।ऐसा लगता है मानों आग अपने गोले छोड़ रही हो‚ यही सब कुछ जेठ में हमें दिखाई देता है।तभी तो कवि कह उठता है—
जेठ तपी धरनी मरु सी अरु लूह चली करि बंजरु टोला
छोड़ती छाँव ठिया अपनी उत पाँजरि होय हरो तन चोला
बाढ़तु ताय तमोगुन सो अरु पाँव परें मग माँहि फफोला
व्याकुल होंय चरा चरह इत आगि छुड़ावति आपन गोला।।
—रघुवीर सिंह अरविन्द

गर्मी की भीषण उमस से व्याकुल ग्रमीण बच्चे नदी पौखरों में कुद–कूदकर नहाते हैं और गर्मी से इस तरह पीछा छुड़ाते हैं—
गर्मी से व्याकुल हुए घर से आकर तंग
दूर नदी में कूदते बच्चे नंग धड़ंग।।
—नित्यगोपाल कटारे

गर्मी के प्रभाव से वृक्ष भी झुलस से गए हैं और सूर्य की किरणें तप कर लाल हो गई हैं—
“प्यासे प्यासे से खड़े‚ रूखे सूखे रूख
जेठ मास के तरनि से‚ तापी मयूख मयूख।।”
—जगदीश प्रसाद सारस्वत ‘विकल’

गर्मी की धूप और कुछ करे या न करे उत्साह भंग तो कर ही देती है—
“चिलचिलाती धूप
हर लेती रूप
झुलसाती अंग–अंग
करती उत्साह भंग”
—भास्कर तैलंग

गर्मी में शरीर से पसीना बहता है और प्यास अधिक लगती है परन्तु प्यास भी है कि बुझने का नाम ही नहीं लेती है।एक दृश्य देखें—
देहों के दरवाजे खोल रहा स्वेद
प्यासों को देख तृप्ति लौटती सखेद।
—गिरिमोहन गुरु

कवि जब ग्रीष्म के तपते सूर्य को निरखता है तो उसका कारण अपने हिसाब से खोजता हैं‚ सूर्य के लाल होने के पीछे कुछ तो कारण होगा लेकिन इसका प्रभाव यह हुआ है कि सब व्याकुल हैं।हवा पानी से रहित हो गई है‚ नीम की छाया भी अब छाया खोजने लगी है‚ नदी का जल कम हो गया है‚ ताल सूख गए हैं—
जाने क्या हो गया‚ कि सूरज इतना लाल हुआ।
प्यासी हवा हाँफती फिर–फिर पानी खोज रही
सूखे कण्ठ–कोकिला‚ मीठी बानी खोज रही
नीम द्वार का‚ छाया खोजे पीपल गाछ तलाशे
नदी खोजती धार कूल कब से बैठे हैं प्यासे
पानी–पानी रटे
रात–दिन‚ ऐसा ताल हुआ
—डॉ0 जगदीश व्योम

यही नहीं कि हम गरमी से केवल परेशान ही होते हैं बल्कि यह हमारी स्मृति में गहरअई तक पैठ बना लेती है और जब हम अपने गाँव घर से दूर होते हैं तो यही गरमी की यादें रह–रहकर हमारे मन में आती हैं—
गरमी की महकती
सुबह को साँसों में भरना
खस से टपकता खुशबू भरा
वो पानी कहाँ है ।
—सुमन कुमार घेई

गरमी से बहुत जल्दी परेशान होने का एक कारण यह भी है कि हम प्रकृति से एकदम कट गए हैं—
मई की उमस में
अपने छोटे से कमरे की
खिड़की और दरवाजों को दिन भर
मजबूती से बन्द रखा मैंने
ताकि लू कि चपेट में ना आ जाऊँ ॐ
—अजित कुमार

ग्रीष्म कितनी भी कष्टदायक क्यों न हो पर हम अच्छी तरह जानते हैं कि ग्रीष्म के कारण ही पानी बरसता है और हरियाली लौटकर आती है—
यह सब कुछ याद रहे
मौसम का साथ रहे
ग्रीष्म ऋतु भी जाएगी
फिर रहेगी प्रतीक्षा
अगले मौसम की
बहार की।
—अश्विन गांधी

गरीब मजदूर गरमी से दूसरों को बचाने के ल्एि दोपहरी में भी काम करते हैं।काश हम उनकी ओर भी ध्यान दे पाते। उषा चौधरी एक ऐसे ही दृश्य का चित्रण करते हुए कहती हैं—
ज़रा सी खिड़की खोल कर देखा
नीम के पेड़ के नीचे
दुबला पतला
आबनूसी रंग वाला बच्चा
तपती धरती में
नंगा पड़ा रो रहा है।
और
मां बाप औरों को
गरमी से बचाने के लिये
ख़स के पर्दे गूंथ रहे हैं।
—उषा चौधरी

धूप का वृक्षों की टहनियों और पत्तियों के बीच से छन–छनकर धरती पर आना दृष्टि का उत्सव है।ग्रीष्म की धूप का ऐसा ही एक मनभावन चित्रण करते हुए पूर्णिमा वर्मन कहती हैं—
झर रही है
ताड़ की इन उंगलियों से धूप
करतलों की
छांह बैठा
दिन फटकता सूप
बन रहे हैं ग्रीष्म के स्तूप।
—पूर्णिमा वर्मन

धूप कितनी ही तेज क्यों न हो कोई काम नहीं रुकेगा‚ यही संसार का नियम है।लोग धूप में बाहर निकलेंगे भी और पाँव के छालों को भी सहलाएँगे—
तेज धूप में आना जाना लगा रहेगा
पैरों के छाले सहलाना लगा रहेगा।
—ज्ञानप्रकाश विवेक

गरमी का प्रभाव गरीब और अमीर दोनों के लिए अलग तरह का होता है। अमीरों के तो कुत्तों के लिए भी ग्रीष्म के आतप से बचाव के उपाय हो जाते हैं पर गरीब के लिए—
गरमी की दोपहरी में
तपे हुए नभ के नीचे
काली सड़कें तारकोल की
अंगारे सी जली पड़ी थीं
छांह जली थी पेड़ों की भी
पत्ते झुलस गए थे
00000

कड़ी धूप से।
बड़े घरों के श्वान पालतू
बाथरूम में पानी की हल्की ठंड़क में
नयन मूंद कर लेट गए थे।
कोई बाहर नहीं निकलता
सांझ समय तक
—शकुंत माथुर

ग्रीष्म का सुरेन्द्र सुकुमार ने बहुत ही जीवन्त चित्र खींचा है—
ज्यों ही आंगन में पड़े जेठ धूप के पांव।
कोठे भीतर घुस गयी छोटी दुल्हन छांव।।
बड़ी दूर सब हो गये पानी पनघट छांव।
झुलस गये हैं दूब के नन्हें नन्हें पांव।।
—सुरेन्द्र सुकुमार

ग्रीष्म का यह आतप थोड़े दिन के लिए ही सही परन्तु सभी जीव जन्तुओं के लिए घोर तपस्या का काल खण्ड होता है।कहते हैं कि ग्रीष्म जितनी ताप छोड़ेगी पावस उतनी ही हरियाली बिखरायेगी।

—डॉ0 जगदीश व्योम

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