Thursday, September 15, 2022

लोकगाथाओं में सांस्कृतिक चेतना

लोकगीतों में सांस्कृतिक चेतना

    मानव की हर्ष और विषादात्मक मूल भावनाएँ जब परिवेश में व्याप्त सुख-दुःख रूपी मनव विकारों की सहज अनुभूति कर तदाकार ही जाती हैं, तब वह अपने मानव की अतल गहराइयों में अवस्थित किसी घटना के पात्रादि को स्वयं पर आरोपित कर लेता है, ऐसे समय पर वाग्देवी स्वयं उसके कण्ठ से फूट पड़ती है। इस प्रकार लोककण्ठ से सहज रूप से निसृत कथा, वृत्तान्त, घटना आदि लोक में प्रचलित शब्दों का परिधान पहनकर इठलाती,बलखाती, थिरकती और गाती हुई लोक को इतना विमोहित कर लेती है कि एक कण्ठ से दूसरे कण्ठ में, अपने अधिवास की अनेकानेक शताब्दियाँ व्यतीत कर देने पर भी, यदा-कदा थोड़े बहुत वस्त्र बदलकर उसी रूप में अपने आकर्षण के जादू से लोक को विमोहित किए रहती है। वर्तमान युग में लोककण्ठ की इस अनिद्य लोक-सुन्दरी का नाम ही लोकगाथा है। 
लोकगाथाएँ लम्बे आख्यान वाले गीत है जिनमें कोई न कोई कथा होती है। लोक कथाओं की वैदिक काल से लेकर रामायण व महाभारत काल तक अक्षुण्ण परम्परा रही है। रामायण में नारद एवं लवकुश तथा महाभारत में संजय को गाथा गायक कहा जा सकता है। लव और कुश तो समय आने पर अपने पिता के पास चले गए परन्तु गाथा गाने की परम्परा छोड़ गए। लोकगाथा गायन की यह परंपरा आज भी बनी हुई है। गाथा गायक ही लोकगाथाओं के संवाहक रहे हैं। लोकगाथाओं की सजीवता तभी तक है जब तक उनका प्रचलन मौखिक रूप से होता है। 
    लोकगाथा गायकों की एक लम्बी परम्परा रही है जिनमें- सूत, माग्ध, बन्दी, कुशीलव, वैतालिक, चारण, भाट, जोगी आदि हैं। लोकगाथाओं में सम्पूर्ण लोक, समाज, रीति-रिवाज, सम्बन्ध, संस्कार, त्यौहार, रूढ़ियाँ, परम्पराएँ आदि सबका चित्रण रहता है। लोक-संस्कृति को लोकगाथाएँ पोषित करती हैं एवं उन्हें अपने उदर में समाहित किए रहती हैं। अपने युग की सभ्यता और संस्कृतियों को समय अपनी परतों के तले दबाता हुआ सतत आगे बढ़ता रहता है। संस्कृतियों का यह दबा-कुचला शरीर लोकगाथाओं की अन्त: चेतना बनकर एक युग से दूसरे युग को उसकी परम्परा एवं विकास की सूचना देता रहता है। लोक मानव सीधा-साधा, सहज विश्वास करने वाला होता है। लोक गाथाओं के माध्यम से जो समाज हमारे समक्ष आता है उसमें सभी पक्षों को स्पष्टत: देखा जा सकता है। धार्मिक तथा नैतिक भावना तो लोक समाज का प्राण ही है। 
    सम्पूर्ण भारतीय संस्कृति का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पहलू धर्म है। हमारे वैदिक ऋषियों ने सामाजिक संरचना के समय धर्म को इस भाँति लोक मानव से जोड़ दिया कि सम्पूर्ण सृष्टि ही धर्ममय हो गयी। लोक-मानव जिन बातों को, जिन गूढ़ रहस्यों को समझने में सदियों लगा देता, धर्म के नाम पर या इस प्रकार की गई शिक्षा को उसने पलभर में सीख लिया। लोकमानव प्रकृति के कण-कण में ईश्वर का निवास मानता है, उसके प्रति पूज्य भाव रखता है। हमारे यहाँ जो भी कर्म किया जाता है उसकी परख की कसौटी स्वर्ग होता है। व्यक्ति कोई कार्य करने से पूर्व उसके विषय में सोचता है कि इसका फल क्या होगा, इस भय से बुरा काम दूर ही बना रहता है। दूसरा सबसे बड़ा डर नरक का होता है। लोक-मानव का हृदय इन्हीं धार्मिक भावनाओं से अनुशासित रहता है। यह अनुशासन उसके अन्दर का अनुशासन है जिसका पालन वह आजीवन करता है। लोकगाथाओं में पूजाविधान के अनेक तरीके प्रचलित हैं। ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गणेश, शिव, कृष्ण, इन्द्र, हनुमान, लक्ष्मी, सरस्वती, पार्वती, गवाँ देवी आदि की स्तुति किए बिना तो लोकगाथा का शुभारम्भ ही नहीं होता। लोकगाथा गायक, गाथा गाने से पूर्व सुमिरनी गाते हैं- 
    सुमिरि सारदा के पग ढरिए, गुरु अपने के चरण मनाय। 
    भुइयाँ गइए जाई खेरे की, माता नामु न जानौं तुमार। 
    जोइ-जोइ आखरु मैया भूलऊँ, दुरगा कण्ठ बैठि लिखि जाउ। 

नारी के सतीत्व की रक्षा करना लोक-मानव अपना धर्म समझता है, नारी का `नारीत्व' ही उसमे यदि छिन जाए तो फिर समाज में उसका जीवन व्यर्थ है- 
    ``अकिली आजु फँसी तबुँअन में, संकट में है धरमु हमार।'' 

किसी बड़े संकट के आ जाने पर लोक-मानव देवी-दवताओं से प्रार्थना करता है। उसे विश्वास है कि सच्चे मन से की गई प्रार्थना को देवी-देवता अवश्य सुनते हैं और वे साक्षात् सहायता करते हैं। भले ही यह कोरा विश्वास ही क्यों न हो परन्तु मनोवैज्ञानिक रूप से लोक-मानव को इस विश्वास से बहुत सम्बल मिलता है। `ढोला' लोकगाथा का यह अंश  दृष्टव्य है- 
    ढोला और करहा ने दुर्गा माँ से डोर लगाई।
    सुन भक्तन की टेर, भगवती ले जमात सँग आई। 
    आइ गए भूत चुरैलें, भैरों और पिशाच
    जोगिनी खप्परु लइ के नाचि रही है नाचु। 
    माँ काली कंकाली जौहरु रही दिखलाय। 
    बुहत से दानी मारे, भाजे कुछ जान बचाय।। 

लोकगाथाओं में देवीपूजन के प्रसंग भरे पड़े हैं। बलि प्रथा का भी चित्रण लोकगाथाओं में मिलता है। पूजा की सामग्री, विधि विधान को लोकगाथाएँ जीवित बनाए हुए हैं- 
    देवी चण्डी के पूजन हित सब सामान लियौ मँगवाय। 
    पान, फूल और अक्षत मेवा सोने थाल लए भरवाय। 
    ध्वजा नारियल और मिठाई, फूलन हार करे तैयार। 
   निम्बू, खप्परु, बकरा, मेढ़ा लइके ज्वालासिंह सरदार।। 

लोक-मानव का यह सहज विश्वास है कि देवी के प्रसन्न होने पर उसका कार्य सफल हो जाएगा। इसी विश्वास को पुष्ट करने के लिए वह पूजा विधान करता है। युद्ध भूमि या किसी महत्वपूर्ण कार्य के लिए जाने वाले वीरों के माथे पर मंगल कामना के लिए टीका और विजय की कामना के लिए भुजा पूजी जाती है- 
    रुचना करिके तब आल्हा को, भुजबल पूजे मल्हन्दे आइ। 
    भुजा पूजि दई नर मलिखे की, दओ माथे पर तिलक लगाइ।। 

संध्या आरती के लिए चोमुखा दीपक जलाना, लोक संस्कृति है। लोकगाथाओं में इसका चित्रण मिलता है- 
    आरति लइ के कर सोने की, वामे चामुख दिअना वारि। 
    ले के चलि भई मल्हना रानी, औ द्वारे पइ पहुँची जाइ।। 

बड़ों का सम्मान करना लोकधर्म है- 
    पायँ लागि के रानि मल्हना के, कर को कंकन धरो उतारि।

पतिव्रता नारी के प्रति लोक-मानव स्म्मान दृष्टि रखता है- 
    पतिव्रता जो चाहे मन में, पल में परलय देय मचाय। 

प्रकृति पूजा में लोक-मानव का अगाध विश्वास है- 
    पहिलो गिरासु दओ धरती कउ, दूजो गऊ चढ़ाओ। 

पुनर्जन्म में लोक-मानव का विश्वास है यह उसे कर्तव्य पथ पर मर्यादित होकर चलने को बाध्य करता है। परलोक का ध्यान उसे बना रहता है, इस भय से वह अपने मानव-धर्म का पालन करता है- 
    हइ ये लीला नारायन की, आवागमन सदा व्यवहार। 
    मरि के जनमइ फिरि मरि जाबइ आबइ लउटि फेरि संसार।। 

लोकगाथाएँ लोक-मानस में यहीं संसार उद्भूत करती रहती हैं कि भले ही सब कुछ विपरीत होने लगे पर मानव को अपना धर्म कदापि नहीं छोड़ना चाहिए- 
    ब्रह्मा सृष्टि रचानो छोड़ें शिवजी छोड़ देइ संहार। 
    धर्म कर्म अरु क्षत्रीपन कौ, तबहुँ न जागन सकै बिसार।। 

लोक मानव का विश्वास है कि यदि व्यक्ति अकेले में भी पाप-कर्म करता है तो भी वह छिपा नहीं रहता, वह प्रकट हो ही जाता है- 
    पाप छिपाये सइ ना छिपिहै, चढ़ि के मगरी पइ चिल्लाय। 

किसी के घर का नमक खा लेने का अर्थ है कि उसके साथ कभी धोखा न करना। यही हमारी लोक-संस्कृति है- 
    मालुम नोनु परो पीछे सइ तब सब कहन लगे सकुचाय। 
    नमक बनाफर को खायो है सो देही में गयो समाय।। 
    इनसै दूजो नेक जो करिहों, परिहों नरक कुण्ड में जाय। 

लोक जीवन में लोक संस्कृति का पूर्ण निर्वाह लोक-मानव करता है। लोक-मानस में जहाँ यह संस्कार समाया हुआ है कि दैवीय शक्ति सब अच्छा ही करती है, इसलिए वह जो कुछ करे सब ठीक ही होगा। वहीं यह संस्कार भी छिपा पड़ा है कि यदि दैवीय शक्ति पक्षपात करती है, अनीति पूर्ण कार्य करती है, बुरे लोगों का साथ दे रही है, तो वह उस आद्यशक्ति से भी दो-दो हाथ करने का हौसला रखता है। असत्य के लिए वह काल से भी लड़ जाता है। एक ऐसा ही चित्रण देखिए- 
    धमक दई चण्डी के ऊपर जाने बड़े जोर से साँग, 
    चंडी गई पाताल समाय। 
    मंदिर की ढोला नैं दीनीं तब ईंट सों ईंट बजाय।। 

ऐसी देवी और ऐसा मंदिर जहाँ अन्याय और अधर्म का कार्य होता हो तथा गलत उद्देश्य की पूर्ति हेतु जिसका प्रयोग किया जाता हो लोकमानस ऐसे देव मठ को तहस-नहस करने में थोड़ा भी संकोच नहीं करता। कितने व्यावहारिक उद्देश्य एवं भावनाएँ निहित हैं लोकगाथाओं में समाहित लोक संस्कृति में। लोक-संस्कृति में भारतीय संस्कृति के सभी प्रमुख तत्व समाहित हैं। आध्यात्मवादी दृष्टिकोण, बहुदेव वाद, समन्वय वाद, सेवा भाव, सम्मान का भाव, पवित्रता, अनेकता में एकता, विश्वास सहनशीलता, नारी सम्मान, ईश्वर पर विश्वास, अतिथि सेवा, शरणागत की रक्षा, व्रत व नियम पालन, अहिंसावादी दृष्टिकोण आदि समस्त भावनाएँ लोक गाथाओं में उभर कर सामने आती हैं। लोकगाथाएँ ही भारतीय संस्कृति को कालजयी बनाए हुए हैं। सांस्कृतिक चेतना का निर्मल स्वरूप लोक गाथाओं में ही देखने को मिलता है।

-डॉ॰ जगदीश व्योम

Sunday, July 09, 2017

गिरधारी लाल को ‘मैन ऑफ द पोइट’ पुरस्कार

गिरधारी लाल को ‘मैन ऑफ द पोइट’ पुरस्कार
—डॉ० जगदीश व्योम


वर्तमान युग पुरस्कारों का युग हैं। कौन कितना बड़ा साहित्यकार है इसे नापो के लिए जो मापक आजकल अपनाया जा रहा है‚ वह पुरस्कार मिलने का मापक है। जिसे जितने अधिक पुरस्कार मिले हैं वह उतना ही बड़ा साहित्यकार कवि या लेखक है। पुरस्कार भी अलग–अलग तरह के हैं। हर पुरस्कार की अपनी लम्बाई, चौड़ाई और वजन निश्चित है‚ इसी से पुरस्कार मिलने वाले का भाव इंच या दो इंच बढ़ता रहता है। यदि आप अभी तक पुरस्कार पाने से वंचित हैं तो आपको किसी मुगालते में नहीं रहना चाहिए। असलियत यह है कि आपका साहित्यिक कद बहुत छोटा है।
पुरस्कारों के बाजार में तरह–तरह के पुरस्कार सजे हुए हैं। महंगे से महंगे और सस्ते से सस्ते। यह तो इस बात पर निर्भर करता है कि आपकी औकात किस पुरस्कार को खरीद पाने की है। ‘खरीदने’ शब्द का अर्थ यह नहीं है कि पुरस्कारों को रुपया पैसे से खरीद लिये जाने की ओर संकेत है। नहीं–नहीं ऐसा बिल्कुल नहीं। मेरा मतलब है कि आपकी साहित्यक औकात क्या है? भई ! पैसे से खरीदने के लिए तो और भी बहुत सी चीजें हैं। लोग पैसों से कविताएं खरीद लेते हैं। कहानियाँ खरीद लेते हैं‚ और तो और लेखकों को ही खरीद लेते हैं‚ जैसा चाहो वैसा लिखवाओ। पैसे देकर कवियों से चाहे रात भर चुटकले पढ़वाओ या भंडैती करवाओ। यह तो सब चलता है..... इसमें दिमाग खराब करने की क्या जरूरत है।
हाँ ! तो बात कर रहा था पुरस्कारों के बाजार की।
इसके भी अलग–अलग स्तर हैं। लोकल बाजार‚ शहरी बाजार‚ जिला स्तर का बाजार और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का बाजार। क्या नहीं है इनमें‚ सब कुछ है। बात तो यह है कि— “सकल पदराथ हैं जग माहीं‚ करमहीन नर पावत नाहीं।”
हमारे मोहल्ले के गिरधारी लाल जब से “मैन ऑफ द पोइट” पुरस्कार लेकर आए हैं‚ तब से वे स्वयं को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का कवि मानने लगे हैं। पत्र–पत्रिकाओं में अपने नाम का ऐसा प्रचार कराते फिर रहें हैं मानो दुनिया भर के कवि तो प्रलय के जल में बह गए‚ सिर्फ मनु के समान यही रह गये हैं। गिरधारी लाल का पुरस्कार “मैड इन इंडिया” नहीं है। ये तो विदेश का है। करोड़ों साहित्यकारों की भीड़ में आखिरकार विदेश पुरस्कार बाजार के विशेषज्ञों ने कुछ सोच समझकर ही गिरधारीलाल को पुरस्कार के लिए चुना होगा।
आश्चर्य तो इस बात पर होता है कि विदेशों में ऐसी–ऐसी दूरबीन आयोजकों के पास रहती हैं जिनसे वे भारतवर्ष के गली–मोहल्ले में बैठे साहित्यकारों को हू–ब–हू वहीं से देखते रहते हैं। वे क्या लिख रहे हैं‚ सब उन्हें पता रहता है। आखिर “मैन आफॅ द पोइट” का पुरस्कार यूँ ही तो नहीं मिल जाता है।
कुछ जानकार कहते हैं कि गिरधारी लाल ने किसी जमाने में चार–पाँच कविताएँ लिखी थीं‚ जिन्हें जब–कभी वे पढ़ लिया करते हैं। उनकी कविताओं की एक–एक पंक्ति में चार–चार‚ पाँच–पाँच गलतियाँ तो रहती ही हैं। दस पेज की एक पत्रिका का संपादन किया था जिसके एक अनुच्छेद में सत्ताईस गलतियाँ थीं। यह गिरधारी लाल के साहित्यिक जीवन का रिकार्ड है। इसी पर मिला है उन्हें “मैन ऑफ द पोइट” का पुरस्कार।
जिस प्रकार केले के पत्ते में से पत्ते निकलते रहते हैं उसी तरह गिरधारी लाल के “मैन ऑफ द पोइट” पुरस्कार को लेकर बातों का जो सिलसिला शुरू हुआ‚ वह बन्द नहीं हुआ। बात में से बात निकलती रही और गली–मोहल्लों में कविता के रेबीज से संक्रमित समाज चटखारे लेकर चटपटी चर्चाएं करता रहा।
एक दिन मुक्त छन्द सी हँसी हँसते गिरधारी लाल मुझे दिखाई दे गए तो मैंने भी सोचा क्यों न दूध का दूध और पानी का पानी कर ही लिया जाये। मैंने पूछा‚ ‘गिरधारी लाल जी ! आपको इतना बड़ा पुरस्कार मिला है जो करोड़ों साहित्यकारों में से किसी एक को मिलता है। परन्तु कविता के जानकार लोग तो आपके बारे में कुछ और ही बातें करते हैं........ कुछ लोगों का कहना है कि ऐसे अनेक धंधेबाज लोगों ने गैंग बना रखे हैं जो साहित्य के नाम पर कुछ पर्चे‚ कुछ प्रमाण पत्र छपवाकर दुनिया भर में पुरस्कार बाँटते फिरते हैं। ये लोग साहित्यकारों के नाम–पत्ते ढूँढ़कर उन्हें पत्र लिखते रहते हैं कुछ लोग इनके चंगुल में फँस जाते हैं तो इन्हें संस्था की सदस्यता के नाम पर सौ–दो सौ रुपये भेज देते हैं और ऐसे ही ‘मैन ऑफ द पोइट’ के पुरस्कार का छपा हुआ कागज़ डाक से प्राप्त कर लेते हैं।’
मेरी बात सुनते–सुनते गिरधारी लाल जी की आँखें लाल हो आयीं पता नहीं क्रोध से‚ पता नहीं शरम से‚ या फिर असलियत सुन लेने से। हाइकु सी हँसी हँसते हुए वे बोले‚ अरो भाई ! ये तो बातें हैं। और बातों का क्या? ये तो चलती रहती हैं। अब जिन्हें पुरस्कार नहीं मिला वे तो चिढ़ेंगे ही‚ आखिरकार मुझे इतना बड़ा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का पुरस्कार मिला है‚ तो लोग तो मुझसे जलेंगे ही। यह तो लोगों का आन्तरिक और जन्मजात सौतिया डाह है। एक कवि आखिर दूसरे कवि के पुरस्कार की सरहाना करे भी तो क्यों ? खैर मेरे जीवन की जो साध थी वह पूरी हो गई। मैं साहित्यिक दुनिया में अमर हो गया। अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिलना कोई हँसी खेल है क्या ? ...... फिर डेढ़ छटाँक हँसी हँसते हुए गिरधारी लाल वहाँ से चले गए।
गिरधारी लाल अपने पुरस्कार का प्रचार–प्रसार दूरदर्शनी विज्ञापनों की तरह करते–कराते रहे। इसी बीच किसी ने इनकम टैक्स वालों के यहाँ गिरधारी लाल के पुरस्कार की समूची प्रचार सामग्री जो पत्र–पत्रिकाओं में वे छपवाते रहे थे भेज दी ........ गिरधारी लाल को पुलिस पकड़ कर ले गई। लॉकअप में बंद कर दिया। पहले तो गिरधारी लाल खुश हुए कि चलो जो लोग उनका रुतबा नहीं मान रहे थे वे भी अब मान जायेंगे। परन्तु दिसम्बर के महीने में थाने की हवालात में दो–तीन शराबियों के साथ गिरधारी लाल रात भर बिना कम्बल के रहे तब उन्हें महसूस हुआ कि थाना क्या चीज होती है। दूसरी रात की कल्पना ने ही गिरधारी लाल को तोड़ दिया। वे कहने लगे‚ “मैं तो चूरन बेचा करता हूँ‚ रेल और बसों में। चूरन बेचने के लिए मैंने जोड़–तोड़ करके दो–चार पंक्तियाँ मिला ली हैं। ये पुरस्कार तो मैंने दो सौ रुपये देकर लिया है।”
थानेदार गिरधारी लाल की बात मानने को तैयार नहीं था। बेचारे गिरधारी लाल गिड़गिड़ा रहे थे। अब वे दुनिया भर के तर्क “मैन ऑफ द पोइट” पुरस्कार की असलियत सिद्ध करने के लिए प्रस्तुत कर रहे थे। गिरधारी लाल ने बातों की फिसलन में फिसलकर एक और कच्चा चिट्ठा खोल दिया। उन्होंने बताया कि यह पुरस्कार तो प्रत्येक मंगलवार को लगने वाले मंगल बजार में एक पंसारी बेचने लाता है। उसी से मैंने उसे खरीदा है। गिरधारी लाल ने थानेदार को और भी कई दुकानों के नाम पते बताए जहाँ–जहाँ ये पुरस्कार मिलते हैं। थानेदार ने इतने साहित्यिक रहस्य बता देने के बदले में गिरधारी लाल को छोड़ दिया। 
सुना है कि गुपचुप तरीके से एक ऐसी सूची तैयार करायी जा रही है जिसमें इस तरह के पुरस्कारों को खरीदकर साबुन की टिकिया की तरह पत्र–पत्रिकाओं में जो लोग अपना विज्ञापन करते–कराते रहते हैं‚ उनके नाम इस सूची में होगें। उनको क्या होगा इसे शायद गिरधारी लाल ही बता पायें।
—डॉ० जगदीश व्योम

लोकगीतों में अभिव्यंजित सौतिया डाह

लोकगीतों में अभिव्यंजित सौतिया डाह
-डॉ० जगदीश व्योम
भारतीय जन–समाज का मनोविज्ञान यदि कहीं संगृहीत है तो वह लोकगीतों में ही हैं।“लोकगीत विद्या देवी के बौद्धिक उद्यान के कृत्रिम फूल नहीं‚ वे मानो अकृत्रिम निसर्ग के श्वास–प्रश्वास हैं। वे भारी विद्वत्ता के भार से सूक्ष्म बुद्धि की नली के फौवारे नहीं‚ अज्ञात मलयाचल से आने वाली सुगन्धित लहरियों से उद्भूत हदय की सूक्ष्म तरगें हैं।” लोक साहित्य के पुरोधा पंडित रामनरेश त्रिपाठी के अनुसार—“ग्राम गीत प्रकृति के उद्गार हैं। इनमें अलंकार नहीं‚ केवल रस है ! छन्द नहीं केवल लय है !! लालित्य नहीं केवल माधुर्य है !!! ग्रामीण मनुष्यों के पुरूषों के मध्य हदय नामक आसन पर बैठकर प्रकृति गान करती है प्रकृति के गान ही ग्राम–गीत हैं।
भारत के विविध अंचलों के अभिव्यक्ति की ही प्रधानता देखने को मिलती है। इसका कारण यह भी हो सकता है कि लेक गीतों का गायन प्रायः नारी कण्ठ द्वारा ही अधिक होता भारतीय समाज पुरूषों को तो अपनी भावनएँ व्यक्त करने के लिए अनेक अवसर प्राप्त होते रहते हैं परन्तु नारियाँ अपनी अनुभूतिजन्य वेदना‚ कुण्ठा‚ इच्छा‚ सुख दुःख आदि की अभिव्यक्ति यदा कदा लोकगीतों के माध्यम से ही कर पाती हैं।विभिन्न अवसरों पर गाये जाने वाले लोकगीतों में नारी मन की सहज अभिव्यक्ति देखी जा सकती हैं।
भारतीय नारी को समग्र रूप से समझना तो निश्चय ही एक दूरूह कार्य है। यह एक ऐसी गुत्थी है जिसे जितना सुलझाने का प्रयास करो और अधिक उलझती जाती है। भारतीय  समाज में नारी का अतिशय सम्मान होता है तो अपमान भी कम नहीं होता‚ वह जिसे जन्म नहीं देती है उसी से प्रताड़ित भी होती है... वह सदियों से शासित रही है और इसी में वह सन्तुष्ठ सी लगती है वह सहनशीलता की प्रतिमूर्ति‚ सेवा—भाव से आप्लावित जीवन जीने के लिए अभिशप्त है। राष्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त नारी के इसी त्रासद रूप को देखकर कभी अन्तर्मन से कराह उठे थे—
“अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी।
आँचल में है दूध और आँखों में पानी।।”
आँचल में है दूध और आँखों में पानी से परिपूूरित भारतीय नारी सब कुछ सहन करती रहती है‚ वह पुरुष प्रधान समाज के पक्षपात पूर्ण नियम—कानूनों को सहती है और खुलकर आह तक नहीं करती। सब कुछ सहने वाली नारी “सौत” को सहन नहीं कर पाती। लोक साहित्य में सौतिया डाह की सहजऔर मार्मिक अभिव्यक्ति देखने को‚ मिलती है। गोपियाँ अपने प्रिय श्याम की खुशी के लिए सारा स्वाँग कर सकती हैं परन्तु उस मुरली को‚ जिसे कृष्ण ने अपने अधरों पर रखकर बजाया है उसे अपने अधरों के पास तक फटकने नहीं देना चाहती है।क्यों? क्योंकि मुरली में गोपियाँ को अपनी सौत की छवि दिखाई देती है। अपने प्रियतम के अधरों पर अपना एकाधिकार समझने वाली गोपियाँ जब अपनी परिकल्पना पर अन्य किसी नारी ह्यमुरली काहृ अनपेक्षित अतिक्रमण देखती है तो भावुक गोपियों को मुरली‚ बाँस की मुरली नहीं वरन अपनी “सौत” प्रतीत होती है और सौत को अपने अधरों से लगाने की कल्पना से भी वे सिहर उठतीं हैं। कितनी सहज अभिव्यक्ति है सौतिया डाह की— 
“मोर पखा सिर ऊपर राखिहौं‚
गुंज की माल गरे पहिरौंगी।
बाँधि पीताम्बर‚ ले लकुटी‚
वन गोधन ग्वारन संग फिरौंगी।
भावतो मोहिं मेरी रसखानि‚
सो तेरे कहे सब स्वाँग करौंगी।
या मुरली मुरलीधर की 
अधरान धरी अधरा न धरौंगी।।”
नारी सम्र्पण की प्रतिमूर्ति है। वह चाहती है कि वह जिसके प्रति पूर्ण रूपेण समर्पित हो‚ उस पर सिर्फ उसी का अधिकार रहेऌ और जब कोई उसक द्वारा निर्मत इस भावनात्मक परिधि के अन्दर प्रवेश करना चाहता है तो वह उसे असहनीय लगता है। कन्नौजी लोक समाज में एक कहावत है कि—“सौति चूनहँ कि बुरी होति”।अर्थात् चूनह्यआटे की भी सौति अच्छी नहीं होती फिर वास्तविक सौत का तो कहना ही क्या।
प्रत्येक पत्नी अपने पति पर पूर्ण अधिकार चाहती है‚ भले ही वह कुरूप हो। जब उसके अहं पर ठेस लगती है तो उसका नारीत्व जाग उठता है और वह 'न समस्त अवरोधों को मिटा डालना चाहती है जो उसके प्रेम में बाधक हैं। इन अवरोधकों को में वह जिसे सबसे अधिक निकट पाती हैऌ वह है उसके  पति की दूसरी पत्नी या प्रेमिका।ऐसी स्थिति में वह स्वयं को रोक नहीं पाती और उसका अनिष्ट करने का हर सम्भव प्रयास करती है। यह सौतिया डाह नारी के मानसिक धरातल में इतना गहरा बैठा है कि वह इसके नाम से ही चौंक उठती है‚ इसकी कल्पना से ही सिहर उठती है तथा सौत के प्रतीकों से भी डाह रखने लगती है।
नारी के अन्तर्मन की यह कुण्ठा‚ डाह‚ईष्र्या लोक गीतों के माध्यम से जहाँ अवसर मिला है‚ सहज रूप से प्रस्फुटित हुई है। नारी जिस बात को सीधे—सीधे  नहीं कह पाती उस संवेदनात्मक मनोविज्ञान को लोक—गीत सहज रूप से प्रकट कर देते हैं। नारी समाज में “सौत” शब्द गाली के रूप में प्रयुक्त होता है। पति और पत्नी के अबाध प्रेम के मध्य पति की बहन और पत्नी की ननद‚ अपने भाई के प्यार का कुछ हिस्सा बाँट लेती है‚ पत्नी को यह भी खलता है इसलिए
कभी—कभी हास—परिहास में और कभी आवेश में भाभियाँ अपनी ननदों के लिए सौत शब्द का प्रयोग करती पायी जाती है।भले ही यह हास—परिहास की बात हो परन्तु नारी के अचेतन मानस में अंकुरित मानसिकता का परिचायक तो है ही।
भारतीय नारी अपने पति को हर प्रकार से सन्तुष्ट करना अपना धर्म मानती है। इसके लिए वह प्रयास करती रहती है‚ परन्तु यदि नारी में कोई कमी है तो वह उसे अपना दुर्भाग्य या ईश्वर प्रदत्त अभिशाप समझ कर सहन कर लती है‚ और अपनी हार मानकर विवशता के आँसू पी लेती है। बाँझ होने‚ लूली—लँगड़ी होने या अन्य कोई खोट होने की स्थिति में कभी—कभी पत्नी स्वंय अपने पति से दूसरी शादी का प्रस्ताव रखती हुई दिखाई पड़ जाती है। यह उसका अपने पति के प्रति पूज्य भाव का ही प्रस्फुटन है। इसके विपरीत वह सौत का उलाहना पति को देती ही रहती है :—
“जो मैं होती लूली लँगड़ी‚ तो लउते सौतनियाँ‚
मेरी हिरनी जैसी चाल बलमा क्यों लाए सौतनियाँ‚
जो मैं होती बाँझ—बाँझनियाँ तो लउते सौतनियाँ‚
मेरे खेलें दुइ दुइ लाल बलमा क्यों लाए सौतनियाँ।।”
सौतिया डाह की एक विशेषता यह है कि नारी का पति किसी अन्य स्त्री के प्रति आकृष्ट होकर उससे पत्नी व्यवहार रखता है तो पत्नी को पति के प्रति उदासीन हो जाना चाहिए तथा पति से सम्बन्ध विच्छेद कर लेना चाहिए परन्तु ऐसा नहीं होता। पत्नी—पति से तो व्यंग्य बाण चलाकर ही अपने कत्र्तव्य की इति श्री कर लेती है परन्तु जिस नारी ने उसके पति को अपने प्रेम पाश में आबद्ध किया है‚ वही उसकी असली दुश्मन होती है। उस नारी को‚ यदि पत्नी का वश चले तो जीवित कदापि न छोड़े। लोक समाज में नारियों के झगड़ों के मूल में सौतिया डाह जनित कारण अधिक रहते हैं।नारी अपने प्रियतम को अपने तक ही संकुचित बनाकर रखना चाहती है और चाहती है पूर्ण समर्पण।
नैना भीतर आउ तू‚ पलक मूँद मैं लेउँ
ना हौं देखूँ और कू‚ ना तोहि देखन देहुँ
परन्तु पुरुष प्रधान समाज में‚ पुरुष बँधकर रहना नहीं चाहता। वह इसमें अपना पौरुष समझता है कि अन्य नारियाँ उसके प्रति आकर्षित होती हैं। इसलिए वह इसे मनोभाव का व्यावहारिक प्रयोग करने का प्रयास करता रहता हैं। यद्यपि नारी में भी ऐसी भावनाएँ होती हैं परन्तु वह आदर्शों एवं मर्यादा के भारी भरकम पत्थर से दबी हुई है तथा दबी रहने का अभ्यस्त सी हो गई। इसलिए वह हर—पुरुूा के बारे में सोचना भी पाप मानती है। पति के प्रति समर्पित पत्नी जब यह जान पाती है कि उसका पति किसी अन्य स्त्री के साथ रात बिताकर आया है‚तो उसकी कोमल भावनात्मक द्दष्टि में पति का चेहरा कुम्हलाया— सा लगता है। ऐसी सूक्ष्म और नारी मनोविज्ञान की झलक लोक गीतों में ही मिल सकती है—
हरे—हरे सैयाँ अनार के फूल‚
देखते निक लागे ए हरी।
हरे—हरे सोए सौति के संग‚
बलमु कुम्हिलाए ए हरी
इसी तथ्य को लोक कवि ईश्वरी ने एक भौंरे के माध्यम से स्पष्ट किया है तथा उसे उपेक्षा से देखते हुए जूठी पत्तल चाटने वाला कौवा या कुत्ता तक कह डाला है—
भौंरा जात पराए बागै तनिक लाज नहीं आवै
घर की कली कौन कम फूली‚ काहे न लेत परागै
जूठी—जाठी‚ पाातर—ईतुर भावै कूकर कागै।
एकाधिक पत्नियों के पति की स्थिति कभी—कभी देखने लायक हो जाती है। यौवन के जोश में व्यक्ति होश खो देता है और जब यौवन का ज्वार उतरता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। ऐसे दोनों पत्नियों के बीच का मोहरा मात्र बनकर रह जाते हैं। लोक समाज में इस तरह के अनेक उदाहरण  सहज ही देखने कौ मिल जाते हैं। बेचारी दोनों सेज पर सोने के लिए अपनी—अपनी ओसरीह्यनिश्चित दिनहृ तय कर लेती हैं।कितना र्मािर्मक चित्रण है इस प्रसंग का। उस व्यक्ति का सुख—चैन भला कैसे बना रह सकता है जिसके घर में दो पत्नियाँ हों। भगवान् ही मालिक है उसकी कुशलता का—
कैसे जिअइँ जिनके दुइ—दुइ नारी
बड़की कहै हमै लगुरा बनबइबे‚
छुटकी कहै लगुरा बारी सारी
बड़की कहै हमै ककना बनबइबे‚
छुटकी कहै ककना बारी सारी
बड़की कहै हम गंगा नहइबे‚
छुटकी कहै जमुना की तयारी
बड़की कहै हम ताँगा में जइबे‚
छुटकी कहै मोटर की सवारी
बड़की कहै हम सिजिया पै सोइबे‚
छुटकी कहै ओसरी है हमारी
सौतें आपस में खूब गाली—गलौज करतीं है।जब उनके अन्दर का सौतिया डाह भड़क उठता है तो वे अक्सर हाथा—पाई पर भी उतर आती हैं। लोकगीतों में सौत की हत्या कराने के लिए कभी भाई का‚ कभी देवर आदि का सहारा लेने का वर्णन मिलता है। कभी—कभी नायिका स्वयं ही सौत की हत्या के लिए तत्पर दिखाई पड़ती है—
देउ न सासु मेरी छुरिया कटरिया
कोउ‚ डारइँ सउति कउ मारि 
अपने पति पर प्राण न्यौछावर करने वाली भारतीय नारी सौत की छाया से भी दूर रहने की प्रार्थना ईश्वर से करती रहती है। परन्तु ‘सौतिया डाह’ का डर नारी
हृदय में इस प्रकार घर कर बैठा है कि उसकी मानसिक चेतना हर पलऌ हर क्षण आशंकित होती रहती है। शायद ही ऐसी कोई नारी हो जो सौतिया डाह की अनुभूति से सर्वथा वंचित हो। उन्हें पग—पग पर सौतिया डाह उद्वेलित करता रहता है। लोक नारी का पति जब तक बाहर से घर नहीं आ जाता‚ उसका मन शंकाकुल बना रहता है। बरसात की अँधेरी रातों में विरहिणी नारी की बेचैनी और अधिक बढ़ जाती है। ऐसे में उसे डर सिर्फ इस बात का रहता है कि
हो न हो उसके पति को किसी नारी ने अपने रूप पाश में फाँस लिया है— 
बादरु गरजै बिजुरी तड़कइ‚ 
बैरिन ब्यारि चलै पुरवैया
काहू सौतिन ने भरमाए‚
ननदी फेरि तुम्हारे भैया
नारी के अचेतन मानस में सौत का ऐसा डर बैठा हुआ है कि वह सोते‚ जागते‚ चलते—फिरते‚ हर समय उसी से सशंकित रहती है।उसके प्रिय को उससे विलग करने वाली प्रत्येक जड़ व चेतन वस्तु उसकी सौत बन जाती है और ऐसी प्रत्येक सौतजन्य बाधा के लिए वह उनके अनिष्ट की कामना करती है। इन पंक्तियों के लेखक को लोकगीतों का संग्रह करते समय सौतिया डाह की जलन से झुलसा हुआ एक ऐसा लोकगीत मिला‚ जिसे सौतिया डाह जन्य अनुभूति का उत्कृष्टतम लोकगीत कहा जा सकता है। दूसरों के खेतों में या कारखानो में काम करने के लिए जाने वाले ग्रामीण मजदूर जब अपनी पत्नियों को छोड़कर दूर देश के लिए रवाना होते हैं तो उन्हें ले जाने वाली रेलगाड़ी‚ बस‚ नाव आदि सबमे विरहिनी पत्नियाँ अपनी सौत की छवि ही देखती है। क्योंकि  उनके पति को उनसे विलग करने में उनका भी सहयोग रहा है।
भोली—भाली नारी रेलगाड़ी को ही अपनी सौत के रूप में देखती है और उसके अनिष्ट की कामना करती है। कैसी अद्भुत और विलक्षण कल्पना है नारी के भोले—भाले रूप निरीह मन की। ऐसी निर्मल कल्पना की अभिव्यक्ति लोकगीतों में ही देखने को मिलती है‚ अन्यत्र नहीं। जिस टिकट से उनका पति यात्रा कर रहा है‚ टिकट‚ जहाँ बह जा रहा है वह स्टेशन‚ जिस साहब के यहाँ नौकरी करता है वह साहब सब‚ उस वियोगिनी नारी  को अपने शत्रु प्रतीत होते हैं। सबके रूप में वह सौत के स्वरूप को देखती है और उनके इष्ट की कामना करती है‚ उन्हें कोसती है‚ उन्हें गाली देती है।
रेलिया बैरिन पिया को लिए जाइ रे
जौन टिकसवा से पिया मोरे जइहइँ
आवै आँधी टिकस उड़ि जाइ रे
रेलिया ...........

जौने टेसनवा पै पिया मोरे उतरें
लागै अगिया टेसन बरि जाइ रे
आवै बढ़िया सहरु बहि जाइ रे
रेलिया ...........

जौने सहबवा के पिया मोरे नौकर 
लागे गोलिया साहब मरि जाइ रे 
रेलिया ...........

जौने सवतिया के पिया मोरे आशिक
टूटै बिजुरी सौति मरि जाइ रे 
रेलिया बैरिन पिया को लिए जाइ रे

अपने पति के लिए यमराज तक से जूझ जाने वाली भारतीय नारी पति के पथ में आने वाले अन्धकार को देदीप्यमान नक्षत्र बनकर दूर भगाती है परन्तु जब—जब उसके पथ में सौत रूपी राहु पड़ जाता है‚ तो उसके जीवन में ग्रहण लग जाता है। कभी तो यह ग्रहण अल्पकालिक होता है परन्तु कभी—कभी यह ग्रहण इतना दीर्घकालिक होता कि बेचारी नारी रूपी नक्षत्र को समूचा निगल ही जाता है।

            
-डॉ० जगदीश व्योम
बी-12ए / 58 ए
सेक्टर-34, नोएडा 
पिन कोड-201301




जब जब बाजै खँजड़िया

-डॉ0 जगदीश व्योम

लोक जीवन में जन्मोत्सव के गीतों को सोहर कहा जाता है। किसी स्त्री के गर्भवती होने पर अथवा शिशु के जन्म के उपरान्त विशेष रूप से छठी तथा बरहीं के दिन सोहर नामक गीत सोल्लास गाये जाते हैं। सोहर गाने की प्रथा मांगलिक है और प्रायः सभी हिन्दी भाषा-भाषी प्रदेशों में इसका प्रचलन है। सोहर की शाब्दिक व्युत्पत्ति संस्कृत भाषा के सूतिकागृह और प्राकृत भाषा के सुइहर से बताई जाती है। सोहर को सोहिली या सोहिला भी कहते हैं।
मध्य-युगीन हिन्दी साहित्य में सोहर के लोक प्रचालित काव्य रूप तथा सोहर छन्द का उपयोग पर्याप्त मात्रा में किया गया है। कबीरदास की अगाध्ा मंगल तथा गोस्वामी तुलसीदास की जानकी मंगल, पार्वती मंगल तथा रामलला नहछू नामक काव्य कृतियाँ उल्लेखनीय हैं। सोहर वस्तुतः अवधी भाषी क्षेत्र का अपना लोकगीत है। अवध के सामाजिक जीवन में सर्वत्र राम रमे हुए है। बिना राम के तो अवध्ा प्रान्त का लोकमानस शायद चलना ही नहीं जानता; सभी के राम हैं और सब राम के हैं। इसीलिए जब लोकमानस, लोक साहित्य के माध्यम से प्रतिबिम्बित होता है तो उसमें राम की उपस्थिति प्रायः सर्वत्र दिखाई देती है।
लोकगीत हमारी प्राचीन संस्कृति के सहज प्रहरी हैं। मानव समाज के रीतिरिवाज एवं जीवन की अनायास प्रवाहात्मक अभिव्यक्ति लोकगीतों में मिलती है, परन्तु “भारतीय लोक-संस्कृति के संरक्षक, प्रतिष्ठापक ये ग्रामीण, परमहंस अथवा अबोध बालक की भाँति स्वयं अपने को कुछ भी नहीं समझा करते। इनके मर्म और वास्तविक स्वरूप को अध्ययन मननशील विद्वान ही समझते हैं।”1 लोकसाहित्य के पुरोधा पं. रामनरेश त्रिपाठी के अनुसार- “ग्रामगीत प्रकृति के उद्गार हैं। इनमें अलंकार नहीं, केवल रस है! छन्द नहीं, केवल लय है!! लालित्य नहीं, केवल माधुर्य है !! ग्रामीण मनुष्यों के स्त्री-पुरुषों के मध्य में हृदय नामक आसन पर बैठकर प्रकृति गान करती है। प्रकृति के वे ही गान ग्रामगीत हैं।”2
         (रामनरेश त्रिपाठी, कविता कौमुदी, भाग-5, प्रस्तावना, पृ0-1-2)
लोकगीतों में मानव की भावनाएँ सहजता एवं ईमानदारी के साथ व्यक्त हुई हैं, कृत्रिमता तो लोकगीतों के पास फटकने तक नहीं पाती।
यूँ तो पुरुषों तथा स्त्रियों के अपने-अपने लोकगीत हैं, परन्तु भावनाओं का सहज प्रवाह वेदनाजन्य अनुभूति तथा पीड़ा की सघनता नारी गीतों में अध्ािक कमलती है। संभवतः इसका कारण यही रहा होगा कि प्राचीन काल से ही हमारा समाज पुरुष-प्रधान समाज रहा है। नारियों की भावनाओं को हमेशा दबाया जाता रहा तथा नारी को सदैव उपेक्षिता रखा गया। नारी को कभी अपने सतीत्व की अग्पि-परीक्षा देनी पड़ी तो कभी उसे सौत को सहना पड़ा। पुत्री जनने पर उसे व्यंग्य-वाण सहने पड़े तो कभी निस्सन्तान होने पर उसे कलंकित होना पड़ा। नारी ने अपने माता-पिता के घर मे पुत्री होने की वजह से उपेक्षा को सहन किया तो ससुराल में कारण-अकारण उसे क्रूर अत्याचारों को सहना पड़ा परन्तु इतना सब सहने के बाद भी उसने कभी मुँह से आह तक नहीं की। प्रकृति ने जब स्वयं नारी की इस असहनीय पीड़ा को निरखा तब अनयास ही “यह हाहाकार स्त्री कण्ठ से आप ही आप फूट है। दुखिया बेचारियों की पुकार जब किसी ने न सुनी तब उनके हृदय की वेदना हलकी करने के लिए कविता देवी ने उन पर दया करके स्वयं यह गीत गाया है....... न जाने कितने दिनों से विवाह के स्वार्थी दलालों, अगुवा और तथाकथित समाज के पथ-प्रर्दशकों के विरुद्ध स्त्रियाँ तो खलिहानों, गली-कूँचों में पूरे जोर से चिल्ला रही हैं, पर पुरुषों ने क्या ध्यान दिया? स्त्रियों के इस हाहाका को किसी ने सुना ! ......” स्त्रियों के इसी हाहाकार, चीत्कार, वेदना, हर्ष आदि की झाँकी लोकगीतों में स्पष्टतः देखी जा सकती है। स्त्रियों की अभिव्यक्ति के तो लोकगीत पर्याय से हो गये हैं। ऐसा लगता है कि स्त्रियाँ बिना लोकगीतों के कुछ कहना ही नहीं जानतीं। वे जो कुछ कहती हैं, लोकगीतों के माध्यम से ही कहती हैं।
लोकगीत प्रकृति के उद्गार हैं, इनके माध्यम से पूरी प्रकृति ही बोलती दिखाई देती है। प्रकृति मानव के साथ उसके सुख में सुखी और दुःख में दुःखी होती है। विरहिणी अपना संदेश पशुओं, पक्षिओं, हवाओं, सूरज, चाँद के माध्यम से प्रिय तक पहुँचाती है। पशु-पक्षी तो लोकमानव के चिर साथी हैं। लोकगीतों में कहीं ये (पशु-पक्षी) सामान्य मानव की तरह सुख-दुःख के भागीदार हैं तो कहीं ये प्रतीक रूप में दिखाई देते हैं। प्रतीकों का प्रयोग वातावरण के संयोजन एवं भवनाओं को और अधिक तीव्रता प्रदान करने में सहायक सिद्ध हुआ है। प्रतीकों के माध्यम से लोकगीतों में कहीं सामन्तवादी व्यवस्था से त्रस्त जन-सामान्य की आह है तो कहीं अपनत्व की भारी-भरकम शिला से दबकर नारी हृदय की करुण कराह, कहीं कोमल भावनाओं के कुचले जाने की कसक है तो कहीं सपनों के छिन जाने की सिसकन।
कुछ लोकगीत तो इतने कारुणिक हैं कि उन्हें सुनने के बाद पत्थर हृदय भी बिना अश्रु गिराये रह नहीं सकता। लगता है कि इन लोकगीतों में प्रकृति स्वयं रोयी है। उसने अपने आँसुओं से समय के दर्पण को निर्मल कर दिया है, इसीलिए इसमें युग-युग की झाँकियाँ प्रतिबिम्बित होती दिखाई पड़ जाती हैं। इन झाँकियों में यूँ तो हास-परिहास, आह, कराह, उत्पीड़न सब कुछ है परन्तु स्वार्थ की वार-वधू हर युग में मुखर दिखाई देती है। इतनी कि उसके लिए निरीह मानवता की आह-कराह भी उसके मनोरंजन का साध्ान मात्र बन जाती है। जब इस तरह का कोई दृश्य समय का आवरण चीर कर लोकगीतों के माध्यम से हमारे सामने आता है, तो कौन ऐसा भावुक हृदय होगा जो उससे प्रभावित न हो और कौन ऐसी लेखनी होगी जो उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप दो शब्द लिखने को मचल न उठती हो।
मानव सदैव से स्वार्थी रहा है। अपने उद्देश्य की प्राप्ति तक उसका जो व्यवहार होता है, प्रायः फल की प्राप्ति पर उसमें परिवर्तन आ जाता है-
काज परे कछु और है, काज सरे कछु और।
रहिमन भँवरी के परे, नदी सिरावत मौर।।
पुत्र प्राप्ति की आकांक्षा प्रत्येक दम्पति रखता है, इसके लिए वह कुछ भी करने को तैयार रहता है। यह सर्वविदित है कि राजा दशरथ के कोई संतान न थी, उन्हों पुत्र प्राप्ति हेतु विशाल यज्ञ किया था। 
-डॉ० जगदीश व्योम
बी-12ए / 58 ए
सेक्टर-34, नोएडा 
पिन कोड-201301




हिंदी में हाइकु कविता

हिंदी में हाइकु कविता

हिन्दी साहित्य की अनेकानेक विधाओं में 'हाइकु' नव्यतम विधा है।  हाइकु मूलत: जापानी साहित्य की प्रमुख विधा है। आज हिंदी साहित्य में हाइकु की भरपूर चर्चा हो रही है। हिंदी में हाइकु खूब लिखे जा रहे हैं और अनेक पत्र-पत्रिकाएँ इनका प्रकाशन कर रहे हैं। निरंतर हाइकु संग्रह प्रकाशित हो रहे हैं। यदि यह कहा जाए कि वर्तमान की सबसे चर्चित विधा के रूप में हाइकु स्थान लेता जा रहा है तो अत्युक्ति न होगी।
हाइकु को काव्य-विधा के रूप में प्रतिष्ठा प्रदान की मात्सुओ बाशो (१६४४-१६९४) ने। बाशो के हाथों सँवरकर हाइकु १७वीं शताब्दी में जीवन के दर्शन से अनुप्राणित होकर जापानी कविता की युग-धारा के रूप में प्रस्फुटित हुआ। आज हाइकु जापानी साहित्य की सीमाओं को लाँघकर विश्व-साहित्य की निधि बन चुका है।
हाइकु अनुभूति के चरम क्षण की कविता है। सौंदर्यानुभूति अथवा भावानुभूति के चरम क्षण की अवस्था में विचार, चिंतन और निष्कर्ष आदि प्रक्रियाओं का भेद मिट जाता है। यह अनुभूत क्षण प्रत्येक कला के लिए अनिवार्य है। अनुभूति का यह चरम क्षण प्रत्येक हाइकु कवि का लक्ष्य होता है। इस क्षण की जो अनुगूँज हमारी चेतना में उभरती है, उसे जिसने शब्दों में उतार दिया, वह एक सफल हाइकु की रचना में समर्थ हुआ। बाशो ने कहा है, "जिसने जीवन में तीन से पाँच हाइकु रच डाले, वह हाइकु कवि है। जिसने दस हाइकु की रचना कर डाली, वह महाकवि है।"
(प्रो. सत्यभूषण वर्मा, जापानी कविताएँ, पृष्ठ-२२)
हाइकु कविता को भारत में लाने का श्रेय कविवर रवींद्र नाथ ठाकुर को जाता है।
"भारतीय भाषाओं में रवींद्रनाथ ठाकुर ने जापान-यात्रा से लौटने के पश्चात १९१९ में 'जापानी-यात्री' में हाइकु की चर्चा करते हुए बंगला में दो कविताओं के अनुवाद प्रस्तुत किए। वे कविताएँ थीं -
पुरोनो पुकुर
ब्यांगेर लाफ
जलेर शब्द।

पचा डाल
एकटा को
शरत्काल।


दोनों अनुवाद शब्दिक हैं और बाशो की प्रसिद्ध कविताओं के हैं।"
(प्रो. सत्यनारायण वर्मा, जापानी कविताएँ, पृष्ठ-२९)
हाइकु कविता आज विश्व की अनेक भाषाओं में लिखी जा रही हैं तथा चर्चित हो रही हैं। प्रत्येक भाषा की अपनी सीमाएँ होती हैं, अपनी वर्ण व्यवस्था होती है और अपना छंद विधान होता है, इसी के अनुरूप उस भाषा के साहित्य की रचना होती है। हिंदी देवनागरी लिपि में लिखी जाती है। यह लिपि वैज्ञानिक लिपि है और (अपवाद को छोड़कर) जो कुछ लिखा जाता है वही पढ़ा जाता है। हाइकु के लिए हिंदी बहुत ही उपयुक्त भाषा है।
हाइकु सत्रह (१७) अक्षर में लिखी जाने वाली सबसे छोटी कविता है। इसमें तीन पंक्तियाँ रहती हैं। प्रथम पंक्ति में ५ अक्षर, दूसरी में ७ और तीसरी में ५ अक्षर रहते हैं। संयुक्त अक्षर को एक अक्षर गिना जाता है, जैसे 'सुगन्ध' में तीन अक्षर हैं - सु-१, ग-१, न्ध-१) तीनों वाक्य अलग-अलग होने चाहिए। अर्थात एक ही वाक्य को ५,७,५ के क्रम में तोड़कर नहीं लिखना है। बल्कि तीन पूर्ण पंक्तियाँ हों।
अनेक हाइकुकार एक ही वाक्य को ५-७-५ वर्ण क्रम में तोड़कर कुछ भी लिख देते हैं और उसे हाइकु कहने लगते हैं। यह सरासर ग़लत है, और हाइकु के नाम पर स्वयं को छलावे में रखना मात्र है। अनेक पत्रिकाएँ ऐसे हाइकुओं को प्रकाशित कर रही हैं। यह इसलिए कि इन पत्रिकाओं के संपादकों को हाइकु की समझ न होने के कारण ऐसा हो रहा है। इससे हाइकु कविता को तो हानि हो ही रही है साथ ही जो अच्छे हाइकु लिख सकते हैं, वे भी काफ़ी समय तक भ्रमित होते रहते हैं।
हाइकु कविता में ५-७-५ का अनुशासन तो रखना ही है, क्योंकि यह नियम शिथिल कर देने से छंद की दृष्टि से अराजकता की स्थिति आ जाएगी। कोई कुछ भी लिखेगा और उसे हाइकु कहने लगेगा। वैसे भी हिंदी में इतने छंद प्रचलित हैं, यदि ५-७-५ में नहीं लिख सकते तो फिर मुक्त छंद में अपनी बात कहिए, क्षणिका के रूप में कहिए उसे 'हाइकु' ही क्यों कहना चाहते हैं? अर्थात हिंदी हाइकु में ५-७-५ वर्ण का पालन होता रहना चाहिए यही हाइकु के हित में हैं।
अब ५-७-५ वर्ण के अनुशासन का पूरी तरह से पालन किया और कर रहे हैं, परंतु मात्र ५-७-५ वर्णों में कुछ भी ऊल-जलूल कह देने को क्या हाइकु कहा जा सकता है? साहित्य की थोड़ी-सी भी समझ रखने वाला यह जानता है कि किसी भी विधा में लिखी गई कविता की पहली और अनिवार्य शर्त उसमें 'कविता' का होना है। यदि उसमें से कविता ग़ायब है और छंद पूरी तरह से सुरक्षित है तो भला वह छंद किस काम का!
हाइकु साधना की कविता है। किसी क्षण विशेष की सघन अनुभूति कलात्मक प्रस्तुति हाइकु है। प्रोसत्यभूषण वर्मा के शब्दों में -
"आकार की लघुता हाइकु का गुण भी है और यही इसकी सीमा भी। अनुभूति के क्षण की अवधि एक निमिष, एक पल अथवा एक प्रश्वास भी हो सकता है। अत: अभिव्यक्ति की सीमा उतने ही शब्दों तक है जो उस क्षण को उतार पाने के लिए आवश्यक है। हाइकु में एक भी शब्द व्यर्थ नहीं होना चाहिए। हाइकु का प्रत्येक शब्द अपने क्रम में विशिष्ट अर्थ का द्योतक होकर एक समन्वित प्रभाव की सृष्टि में समर्थ होता है। किसी शब्द को उसके स्थान से च्युत कर अन्यत्र रख देने से भाव-बोध नष्ट हो जाएगा। हाइकु का प्रत्येक शब्द एक साक्षात अनुभव है। कविता के अंतिम शब्द तक पहुँचते ही एक पूर्ण बिंब सजीव हो उठता है।"
(प्रो. सत्यभूषण वर्मा, जापानी कविताएँ, पृष्ठ-२७)
थोड़े शब्दों में बहुत कुछ कहना आसान नहीं है। हाइकु लिखने के लिए बहुत धैर्य की आवश्यकता है। एक बैठक में थोक के भाव हाइकु नहीं लिखे जाते, हाइकु के नाम पर कबाड़ लिखा जा सकता है। यदि आप वास्तव में हाइकु लिखना चाहते हैं तो हाइकु को समझिए, विचार कीजिए फिर गंभीरता से हाइकु लिखिए। निश्चय ही आप अच्छा हाइकु लिख सकेंगे। यह चिंता न कीजिए कि जल्दी से जल्दी मेरे पास सौ-दो सौ हाइकु हो जाएँ और इन्हें पुस्तक के रूप में प्रकाशित करा लिया जाए। क्योंकि जो हाइकु संग्रह जल्दबाजी में प्रकाशित कराए गए हैं, वे कूड़े के अतिरिक्त भला और क्या है? इसलिए आप धैर्य के साथ लिखते रहिए जब उचित समय आएगा तो संग्रह छप ही जाएगा। यदि आप में इतना धैर्य है तो निश्चय ही आप अच्छे हाइकु लिख सकते हैं। प्राय: यह देखा गया है कि जो गंभीर साहित्यकार हैं वे किसी भी विधा में लिखें, गंभीरता से ही लिखते हैं। हाइकु के लिए गंभीर चिंतन चाहिए, एकाग्रता चाहिए और अनुभूति को पचाकर उसे अभिव्यक्त करने के लिए पर्याप्त धैर्य चाहिए।
हिंदी साहित्य का एक दुर्भाग्य और है कि अनेक ऐसे लोग घुस आए हैं जिनका कविता या साहित्य से कुछ भी लेना-देना नहीं है। जब हाइकु का नाम ऐसे लोगों ने सुना तो इन्हें सबसे आसान यही लगा, क्योंकि ५-७-५ में कुछ भी कहकर हाइकु कह दिया। अपना पैसा लगाकर हाइकु संग्रह छपवा डाले। यहाँ तक तो ठीक है क्योंकि अपना पैसा लगाकर कोई कुछ भी छपवाए, भला उसे रोकने वाला कौन है। लेकिन जब पास-पड़ोस के नई पीढ़ी के नवोदित हाइकुकारों को उनका सानिध्य मिला तो उन्होंने उन्हें भी अपने साथ उसी कीचड़ में खींच लिया। उनसे भी रातों-रात हज़ारों हाइकु लिखवा डाले और भूमिकाएँ स्वयं लिखकर भूमिका लेखक की अपूर्ण अभिलाषा को तृप्त कर डाला। और हाइकु या अन्य विधा की एक बड़ी संभावना की भ्रूणहत्या कर डाली।
नए हाइकुकारों को ऐसे लोगों से बचने की आवश्यकता है। हाइकु लिखते समय यह देखें कि उसे सुनकर ऐसा लगे कि दृश्य उपस्थित हो गया है, प्रतीक पूरी तरह से खुल रहे हैं, बिंब स्पष्ट है। हाइकु लिखने के बाद आप स्वयं उसे कई बार पढ़िए, यदि आपको अच्छा लगता है तो निश्चय ही वह एक अच्छा हाइकु होगा ही।
हाइकु काव्य का प्रिय विषय प्रकृति रहा है। हाइकु प्रकृति को माध्यम बनाकर मनुष्य की भावनाओं को प्रकट करता है। हिंदी में इस प्रकार के हाइकु लिखे जा रहे हैं। परंतु अधिकांश हिंदी हाइकु में व्यंग्य दिखाई देता है। व्यंग्य हाइकु कविता का विषय नहीं है। परंतु जापान में भी व्यंग्य परक काव्य लिखा जाता है। क्योंकि व्यंग्य मनुष्य के दैनिक जीवन से अलग नहीं है। जापान में इसे हाइकु न कहकर 'सेर्न्यू' कहा जाता है। हिंदी कविता में व्यंग्य की उपस्थिति सदैव से रही है। इसलिए इसे हाइकु से अलग रखा जाना बहुत कठिन है। इस संदर्भ में कमलेश भट्ट 'कमल' का विचार उचित प्रतीत होता है -
"हिंदी में हाइकु और 'सेर्न्यू' के एकीकरण का मुद्दा भी बीच-बीच में बहस के केंद्र में आता रहता है। लेकिन वस्तुस्थिति यह है कि हिंदी में हाइकु और 'सेर्न्यू' दोनों विधाएँ हाइकु के रूप में ही एकाकार हो चुकी है और यह स्थिति बनी रहे यही हाइकु विधा के हित में होगा। क्योंकि जापानी 'सेर्न्यू' को हल्के-फुल्के अंदाज़ वाली रचना माना जाता है और हिंदी में ऐसी रचनाएँ हास्य-व्यंग्य के रूप में प्राय: मान्यता प्राप्त कर चुकी हैं। अत: हिंदी में केवल शिल्प के आधार पर 'सेर्न्यू' को अलग से कोई पहचान मिल पाएगी, इसमें संदेह है। फिर वर्ण्य विषय के आधार पर हाइकु को वर्गीकृत/विभक्त करना हिंदी में संभव नहीं लग रहा है। क्योंकि जापानी हाइकु में प्रकृति के एक महत्वपूर्ण तत्व होते हुए भी हिंदी हाइकु में उसकी अनिवार्यता का बंधन सर्वस्वीकृत नहीं हो पाया है। हिंदी कविता में विषयों की इतनी विविधता है कि उसके चलते यहाँ हाइकु का वर्ण्य विषय बहुत-बहुत व्यापक है। जो कुछ भी हिंदी कविता में हैं, वह सबकुछ हाइकु में भी आ रहा है। संभवत: इसी प्रवृत्ति के चलते हिंदी की हाइकु कविता कहीं से विजातीय नहीं लगती।"
(कमलेश भट्ट कमल, 'हिंदी हाइकु : इतिहास और उपलब्धि' - संपादक- डॉ. रामनारायण पटेल 'राम' पृष्ठ-४२)
हिंदी में हाइकु को गंभीरता के साथ लेने वालों और हाइकुकारों की लंबी सूची है। इनमें प्रोफेसर सत्यभूषण वर्मा का नाम अग्रणी हैं। डॉ. वर्मा ने हाइकु को हिंदी में विशेष पहचान दिलाई है। वे पूरी तत्परता के साथ इस अभियान में जुड़े हुए हैं। कमलेश भट्ट 'कमल' ने हाइकु-१९८९ तथा हाइकु-१९९९ का संपादन किया जो हाइकु के क्षेत्र में अति महत्वपूर्ण कार्य माना जाता है। डॉ. भगवत शरण अग्रवाल हाइकु भारती पत्रिका का संपादन कर रहे हैं और हाइकु पर गंभीर कार्य कर रहे हैं। प्रो. आदित्य प्रताप सिंह हाइकु को लेकर काफ़ी गंभीर हैं और हिंदी हाइकु की स्थिति को सुधारने की दिशा में चिंतित हैं। उनके अनेक लेख प्रकाशित हो चुके हैं। हाइकु दर्पण पत्रिका का संपादन डॉ. जगदीश व्योम कर रहे हैं, यह पत्रिका हाइकु की महत्वपूर्ण पत्रिका है। डॉ. रामनारायण पटेल 'राम' ने 'हिंदी हाइकु : इतिहास और उपलब्धियाँ' पुस्तक का संपादन किया है। इस पुस्तक में हाइकु पर अनेक गंभीर लेख हैं। लखनऊ विश्वविद्यालय से कस्र्णेश भट्ट ने हाइकु पर शोधकार्य किया है। हाइकुकारों में इस समय लगभग २०० से भी अधिक हाइकुकार हैं जो गंभीरता के साथ हाइकु लिख रहे हैं। यह संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है।
जिन हाइकुकारों के हाइकु प्राय: चर्चा में रहते हैं उनमें प्रमुख हैं - डॉ. सुधा गुप्ता, डॉ. शैल रस्तोगी, कमलेश भट्ट 'कमल', पारस दासोत, डॉ. रमाकांत श्रीवास्तव, डॉ. आदित्य प्रताप सिंह, डॉ. गोपाल बाबू शर्मा, डॉ. राजन जयपुरिया, डॉ. सुरेंद्र वर्मा, डॉ. जगदीश व्योम, नीलमेन्दु सागर, रामनिवास पंथी आदि हैं।
कुछ हाइकु जो काव्य की दृष्टि से अपने अंतस में बहुत कुछ समाहित किए हुए हैं, दृष्टव्य हैं। डॉ. सुधा गुप्ता हाइकु में पूरा दृश्य उपस्थित कर देती हैं -
माघ बेचारा
कोहरे की गठरी
उठाए फिरे।

शैतान बच्ची
मौलसिरी के पेड़
चढ़ी है धूप।

चिड़िया रानी
चार कनी बाजरा
दो घूँट पानी।



कमलेश भट्ट 'कमल' के हायकु पूरी तरह से खुलते हैं और अपना प्रभाव छोड़ते हैं-
फूल सी पली
ससुराल में बहू
फूस सी जली।

कौन मानेगा
सबसे कठिन है
सरल होना।

प्रकृति के किसी क्षण को देखकर उसका मानवीकरण डॉ. शैल रस्तोगी ने कितनी कुशलता से किया है-
कमर बंधी
मूँगे की करघनी
परी है उषा।
गौरैया ढूँढ़े
अपना नन्हा छौना
धूल ढिठौना।
मैया री मैया
पहुना मेघ आए
कहाँ बिठाऊँ?
रूप निहारे
मुग्धा नायिका झील
चाँद कंदील।
निरंतर छीजती जा रही लोक संस्कृति और उजड़ते जा रहे ग्राम्य संस्कृति को लेकर भी हाइकुकार चिंतित हैं। डॉ. गोपालबाबू शर्मा के शब्दों में-
तपती छाँव
पनघट उदास
कहाँ वे गाँव?
अब तो भूले
फाग, राग, कजरी
मल्हार, झूले।
वर्तमान समय में धैर्य के साथ-साथ साहस की भी आवश्यकता है और एकाकीपन व्यक्ति को दार्शनिक चिंतन की ओर ले जाता है- इन भावों को व्यक्त करते हैं निम्नलिखित हाइकु
नभ की पर्त
चीर गई चिड़िया
देखा साहस।  
        -मदनमोहन उपेंद्र

साँझ की बेला
पंछी ऋचा सुनाते
मैं हूँ अकेला! 
        -रामेश्वर कांबोज 'हिमांशु'

युद्ध की विभीषिका कितनी भयावह होती है इसे भुक्तभोगी ही जानते हैं। प्रकृति के प्रकोप को भी व्यक्ति करना असंभव है। व्यक्ति को सँभलने का अवसर ही नहीं मिलता, चाहे वह गुजरात का भूकंप हो या त्सुनामी लहरों का कहर। लेकिन व्यक्ति को जीना तो होगा ही, और जीने का हौसला भी रखना होगा। भले ही सब कुछ उजड़ जाए मगर जब तक लोक हैं, लोकतत्व हैं तब तक आशा रखनी है। दूब (दूब घास) लोक जीवन का प्रतीक है। अकाल के समय जब सब कुछ मिट जाता है तब भी दूब रहती है। यह जीवन का संकेत है। इन्ही भावो को व्यक्त करते हैं डॉ. जगदीश व्योम के ये हाइकु-
छिड़ा जो युद्ध
रोएगी मनुजता
हँसेंगे गिद्ध।
निगल गई
सदियों का सृजन
पल में धरा।
क्यों तू उदास
दूब अभी है ज़िंदा
पिक कूकेगा।
कमल किशोर गोयनका के एक हाइकु में इन विचारों को बड़ी सुंदर अभिवयक्ति मिली है कि युद्ध के विनाशक वक्त गुज़रने के बाद भी भय और त्रासदी की छाया बहुत समय तक उस क्षेत्र पर छायी रहती है। भावी पीढ़ियाँ भी इससे प्रभावित होती हैं। वहीं दूसरी ओर कमलेश भट्ट कमल एक छोटे से हाइकु में कहते हैं कि झूठ कितना ही प्रबल क्यों न हो एक न एक दिन उसे सत्य के समक्ष पराजित होना ही होता है। यही सत्य है। यह भाव हमारे अंदर झूठ से संघर्ष करने की अपरिमित ऊर्जा का सृजन करता है। युवा वर्ग में बहुत कुछ करने का सामर्थ्य है आवश्यकता है तो उन्हें प्रेरित करने की, उन्हें उनकी शक्ति का आभास कराने की। इन्हीं भावों से भरी युवा वर्ग का आवाहन करती पंक्तियाँ है पारस दासोत की। ये तीनो हाइकु देखें-
कोंपल जन्मी
डरी-डरी सहमी
हिरोशिमा में। -कमलकिशोर गोयनका
तोड़ देता है
झूठ के पहाड़ को
राई-सा सच। -कमलेश भट्ट 'कमल'
है जवान तू
भगीरथ भी है तू
चल ला गंगा। -पारस दासोत
हिंदी में हाइकु कविता पर बहुत कार्य हो रहा है। अनेक हाइकु संग्रह प्रकाशित हो रहे हैं। इनमें भले ही कुछ हल्के संग्रह हों परंतु कुछ अच्छे संग्रह हैं। अभी बहुत कुछ निखर कर सामने आएगा।

-डॉ० जगदीश व्योम
बी-12ए / 58 ए
सेक्टर-34, नोएडा 
पिन कोड-201301

बाल साहित्य का केन्द्र लोक साहित्य

बाल साहित्य का केन्द्र लोक साहित्य
                 -डॉ. जगदीश व्योम

लोक जीवन की जैसी सरलतम, नैसर्गिक अनुभूतिमयी अभिव्यंजना का चित्रण लोक–गीतों व लोक–कथाओं में मिलता है, वैसा अन्यत्र सर्वथा दुलर्भ है। लोक–साहित्य में लोक–मानव का हृदय बोलता है। प्रकृति स्वयं गाती–गुनगुनाती है। लोक–साहित्य में निहित सौंदर्य का मूल्यांकन सर्वथा अनुभूतिजन्य है।

लोक–साहित्य उतना ही प्राचीन है जितना कि मानव, इसलिए उसमें जन–जीवन की प्रत्येक अवस्था, प्रत्येक वर्ग, प्रत्येक समय और प्रकृति सभी कुछ समाहित है। इसमें बाल–साहित्य भी प्रचुरता से विद्यममान है। शिशुओं व बालकों के लिए नित–प्रति के मनोरंजन हेतु बाल–साहित्य बडों ने भी रचा है और बालकों ने भी अपने खेलने के लिए गीत रच लिये हैं।
लोक–साहित्य में बाल–कथाओं का बहुत व्यापक संसार है। दादी व नानी से कहानी सुने बिना भला कोई बचपन आगे बढ़ा है? ये बाल–कहानियाँ बाल–जीवन की संजीवनी हैं। इन कहानियों को सुन–सुन कर बालक पूर्ण मानव बनता है। बाल–कथाओं में कुछ लघु छंद की कथाएँ भी होती हैं, जिनमें छोटे–छोटे छंद के साथ कथा–सूत्र आगे बढ़ता है। उदाहरण के लिए कइँटेरा (केंकड़े) और मेंढकी की कथा का कुछ अंश दृष्टव्य है–
लम्बक लेंड़ा, झब्बे कान
तू क्या मुझको दब्बेगा
नाक की नकटी, भुइं में चिपटी
तू क्या मुझको दिखती है।?

मेंढकी ने हाथी की बात सुनी तो पास की झाड़ी में बैठे कइँटेरा से कहने लगी–
लाल पाग के लाला भाई
इसकी बातें सुनते हो ?

कइँटेरा को मेढकी ने लाल पाग का लाला भाई कहकर सम्मान दिया तो वह खुश हो गया और मेंढकी की प्रशंसा में वह बोला–
कुभंकरन कलियान की बेटी
कुत्तों के मुँह क्यों लगती हो।

इस प्रकार के लघु छंदों में संवादयुक्त लोक–कथाओं में पुड़की की कथा, बंदर और सियार, बरसो राम धाड़ाके से, गोग्गो रानी, मटके की कहानी, मैना और चना की कहानी, कौआ और चिड़ी के बच्चे की कहानी विशेष उल्लेखनीय हैं। जहाँ लोक–जीवन में कोई संस्कार बिना लोक–गीतों के पूरा नहीं होता, वहाँ बालकों के लिए तो विशेष रूप से लोक–गीत प्रचलित हैं। बालक जब शिशु होता है, तो माँ उसको थपकी देकर सुलाती है। इन्हें पालने के गीत कहा जाता है। माताएँ बालक सुलाते समय . . .ला . . .ला . . .ला . . .निन्नी . . .निनी . . .निनी . . .। आदि को बड़े आरोह–अवरोह के साथ लयपूर्वक गुनगुनाती हैं। इन शब्दों का कोई अर्थ नहीं होता परंतु शिशु मनोविज्ञान से इस लयात्मकता का गहरा सम्बंधा है। इनका शिशु के स्नायुओं पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ता है। इन मधुर लयों को सुनकर शिशु विश्रांत का अनुभव करते हुए शीघ्र ही सो जाता है।

स्वर–साम्य और स्वर–मैत्री तथा स्वरान्त पर विशेष ध्यान दिया जाता है। एक भोजपुरी बालगीत का अंश दृष्टव्य है–
हाल हाल बबुआ
करुई के ढेबुआ
माई अकसरुआ
बाप दरबरुआ
हाल हाल बबुआ।

बाल–लोकगीतकारों ने बाल–मानस को बहुत निकट से देखा–परखा और उसके अनुरूप लोकगीत रचे हैं–
लल्ला लल्ला लोरी
दूध की कटोरी
दूध में बतासा
लल्ला करे तमासा।

न जाने कब से यह लोकगीत गाया जा रहा है और चन्दा मामा भी न जाने कब से बच्चों को रिझाते आ रहे हैं–
चन्दा मामा दूर के
पुए पकाए बूर के
आप खाएँ थाली में
मुन्ने को दें प्याली में
प्याली गयी टूट
मुन्ना गया रूठ।

शिशुओें को गुदगुदाकर हँसाने के लिए प्रचलित इस बालगीत को देखिए–

चुंत चिरैया दुर्गादासी
अन्नु खाइ पानी की प्यासी
यहीं हगाइ, यहीं मूतइ
घरु कत्ति चली
घरु कत्ति चली
घरु गुल. . .गुल . . .गु. . .गुल. . .गुल. . .

बालकों के मानस में सहज व्यवहार तथा एक–दूसरे की सहायता करने का बीजांकुर बालगीतों के द्वारा सहज ही हो जाता है। कन्नौजी बोली का एक खेल गीत दृष्टव्य है-

कंत खिलाई कौड़ी पाई
बबा हगन गये
उनऊँ नइँ पायी
बा कौड़ी मँइनइँ गंग सिराई
गंगा नइँ गंगाजलु दीनों
गंगाजलु मँइनइँ खेत कउ दीनों
खेत ने मोइ घास दीनी
घास मँइनइँ गऊ कउ दीनी
गऊ नइँ मोहि दूध दीनो
दूध की मैंने खीर पकाई
तनिक तनिक सब घर ने खाई
रही बची सो मोर चटाई
आरे धरी, पिटारे धरी
नयी भीति उठी
पुरानी भीति खसी
धम्म धार . . . 

इस बालगीत के अन्त में– 'नयी भीति का उठना और पुरानी भीति का खसना' सृष्टि की सनातन प्रक्रिया को दर्शाता है। बच्चों का निरन्तर विकास होना ही नयी भीति का उठना है और पुरानी पी.ढी का काल कवलित होना ही 'पुरानी भीति का खसना' है। इतनी व्यावहरिक सोच और दर्शन जैसे गंभीर विषय को सरल–सहज बालगीत बना लेना लोक–मानस के ही बस की बात है।

बच्चों द्वारा रचे और गाये जाने वाले गीत का यह अंश दृष्टव्य है–
माँ ताते पूआ करि लै री
नये ढला में धरि लै री
नानी की गैल बताय दै री
नानी की गैल में सांपु परयौं
जहीं बैठ कै खाइ लै री . . .

आम के पेड़ पर बैठा तोता आम कुतर रहा हो और बच्चा न ललचाये, यह भला कैसे हो सकता है! बच्चा तोते से निवेदन करता है कि उसके ह्यतोते केहृ घर तो भैंस बियानी है। थोड़ी–सी गिजरी वह उसके लिए भी डाल दे। तोते के लिए पेड़ों पर आमों का आना, तोतों के लिए उनकी भैंस का बियाना ही है। बच्चे तो तोतों की दया पर निर्भर हंै। तोते आम कुतरकर डालेंगे, तभी तो उन्हें खाने के लिए मिल पाएँगे–
सुआ सुआ तेरी भैंस बियानी
मोकूँ गिजरी डारे जा
कच्ची होय तौ कच्ची डारु
पकी होय तौ पकी डारु . . .

बादलों को देख कर शरारती बच्चे एक साथ चिल्लाते हैं–
बरसो राम धड़ाके से
बुढ़िया मरि गई फाँके से . . .

बुझौअलों का भी लोक–जीवन में खूब प्रचलन है। बच्चे एक दूसरे से पूछते हैं। कुछ सीखते हैं, कुछ सिखाते हैं–
एक खेत में ऐसा हुआ
आधा बगुला, आधा सुआ
रंग साम्य कस् आधार पर बालकों को मूली की जड़ और पत्तों को बगले और तोते के रंग के साथ जोड़ना बच्चों के लिए लोक–शिक्षा का प्रभावी पाठ है।

'टेसू' के गीत की तुकबंदी बड़ी ही सटीक और प्रभावी होती हैं–
मेरा टेसू यहीं अड़ा
खाने को माँगें दही बड़ा . . .
टेसू के बाल–गीतों में संतों का वाणियों का बाल रूप भी देखने को मिलता है। एक चित्र प्रस्तुत है–
कंकड़ कुंइयाँ सीतल पानी
नौ मन भंग उसी में छानी
चल वे चट्टे, भर लौट्टे, पी पी भंग उड़ाएँ सोट्टे

जीव–जंतुओं के माध्यम से संबंधों की जानकारी देता हुआ यह बालगीत–
''बीवी मेंढकी री तू तो पानी में की रानी
कौआ तेरा भाई–भतीजा,चील तेरी देवरानी
बगुला तेरा छोटा देवर, तू कहाँ की रानी . . .'

एक चित्र और–
सुन सुन सखी, पक्षी का ब्याह था
बगुला बराती आये, जुगुनू मसाला लाये
डोम तो खूब बोले, डोमनी बारात गाये
पोदना को सतायी, बुलबुल करे लड़ाई
ज्युं ही बिल्ली आयी–सारी सभा भगायी।

सप्ताह के दिनों का संबंध बालगीत के माध्यम से–
वृहस्पति मेरी दाई, शुक्र की खबर लायी
शुक्र मेरा भइया, मैं खेलूँ धम्मक धैया
सनीचर मेरा नाना, मुझे कान पकड़ बुलवाना . . .

क्रीड़ा–गीतों की भी भरमार है। खेलों के लिए अलग–अलग बालगीत हैं, जिनका प्रयोग बालक खेलते समय करते हैं। कबड्डी खेलते समय साँस साधने के लिए एक गीत का अंश देखें–
डुडुआ डांढ़े, चलैं पनारे
तुमसे लरिका धद्धरि मसरे . . .
धद्धरि मारें . . .धद्धरि मारे . . .
शरारती बच्चों के मुख से प्रायः सुनने को सह भी मिल जाता है–
ओना मासी धम्म
बाप पढे ना हम।
यह शाक्टायन का प्रसिद्ध मंत्र 'ओम नमः सिद्धम' का बिगड़ा हुआ रूप है। नीचे की पंक्ति बच्चों ने तुक जोड़ कर मिला ली, बस बन गया उनका गीत।

आकाश, बादल, बिजली, जुगुनू आदि का चित्र उकेरता एक बालगीत–
एक पेड़ झलरा,
वाके नीचे पथरा
वाके नीचे लप लप
वाके नीचे झप झप . . .

और अंत में एक पहेली, जिसमें एक भैंस तालब में बैठ गयी। उस पर मेंढकी बैठ गयी। ऊपर से चील ने झपट्टा मारा और मेंढकी को उठा ले गयी–
चार पाग की चापड़ चुप्पो,
वा पै बैठी लुप्पो
आयी सप्पो, लै गयी लुप्पो,
रह गयी चापड़ चुप्पो।

लोक साहित्य में अगणित छवि–चित्र हैं, ठीक बालक की अनंत कल्पनाएँ जैसे।
बाल–मानस कर चिर संग्रह लोक–साहित्य के पास है, वर्तमान समय में लोक–साहित्य के प्रति जागरूकता हुई अतः यह आवश्यक है कि लोक–जीवन में बिखरे अनमोल बाल–साहित्य के खजाने को समेट लिया जाए। कहीं ऐसा न हो कि आधुनिकता की आँँधी हमारी इस धरोहर को उड़ा ले जाए।

-डॉ० जगदीश व्योम
बी-12ए / 58 ए
सेक्टर-34, नोएडा 
पिन कोड-201301

हिंदी कविता में नया साल

हिंदी कविता में नया सालसमकालीनता के परिप्रेक्ष्य में
—डा जगदीश व्योम 
नव वर्ष के उपलक्ष्य में पिछले पचास सालों में जो कविताएँ लिखी गई हैं उनमें समकालीन परिवेश और परिस्थतियों का सुंदर प्रयोग देखने को मिलता है। यही नहीं वे आधुनिक विचारों और मनःस्थितियों का भी सुंदर प्रतिनिधित्व करती हैं।

आज की नववर्ष रचनाएँ 1 जनवरी से शुरू होने वाले ईस्वी संवत के लिए हैं न कि होली पर शुरू होने वाले विक्रम संवत या दीवाली पर शुरू होने वाले शक संवत के विषय में। ईस्वी नव वर्ष के विषय में लिखे जाने के कारण विशेष अंतर यह है कि इसमें ऋतु या उत्सव का शृंगार नहीं बल्कि दैनिक जीवन का आचरण दिखाई देता है। अधिकांश कविताओं का स्वर मंगल कामनाओं के पारंपरिक स्वरूप जैसा है तो भी आधुनिक युग की सच्चाई दिखाने वाली प्रवृत्तियाँ साफ़ नज़र आती हैं।
वर्तमान समय में कवि लगातार बुराइयों से जूझ रहा है और जब वह देखता है कि उसकी लाख कोशिश के बाद भी दुनिया सुधर नहीं रही है तो भी वह हिम्मत नहीं हारता है और दुनिया के अच्छे-अच्छे लोगों को किसी न किसी तरह से बचा लेना चाहता है। इसी संघर्ष में भयावह त्रासदी के बीच वह तीन सौ पैंसठ दिन बिताता है। उसका सपना एक अच्छी दुनिया बनाने का है यदि अच्छी दुनिया नहीं बन पाती है तो वह भले लोगों के साथ कहीं और चले जाने में ही अपनी भलाई समझता है-
मैं सारे स्वप्नों को गूँथ-गूँथकर
एक खूब लंबी नसैनी बनाऊँगा
और सारे भले लोगों को ऊपर चढ़ाकर
हटा लूँगा नसैनी
ऊपर किसी ग्रह पर बैठकर
ठेंगा दिखाऊँगा मैं सारे दुष्टों को
कर डालो, कर डालो जैसे करना हो नष्ट
इस दुनिया को
मैं वहीं उगाऊँगा हरी सब्ज़ियाँ और
तंदूर लगाऊँगा।
- राजेश जोशी
वर्तमान का संघर्ष बुराइयों को दूर करने का ही संघर्ष नहीं है बल्कि संसाधनों की छीना-झपटी का संघर्ष है। जो खा रहे हैं और जिन्हें खाने को नहीं मिल पा रहा है उनके बीच का संघर्ष है। आम आदमी इसे कब तक देखकर चुपचाप बैठा रहा सकता है। उसे बहुत अधिक दबाया नहीं जा सकता। कवि भी इन वास्तविकताओं को लिखे बिना बहुत दिनों तक नहीं रह सकता-
अकेले तुम्हीं सब उड़ाओगे भाई
कि मेरी तरफ़ भी बढ़ाओगे भाई।
तुम्हीं पी रहे हो, तुम्हीं खा रहे हो
तुम्हीं बाँधकर भी लिए जा रहे हो
कहाँ का नियम है बताओगे भाई।
........
बहुत हो चुका अब नहीं मैं सहूँगा
कहूँगा, कहूँगा, कहूँगा, कहूँगा
कहाँ तक मुझे तुम दबाओगे भाई।
-कैलाश गौतम
जो मेहनतकश है वह दुखी रहे, भूखा रहे और जो मेहनत न करे वह मौज मनाए, यह विडंबना भी कविताओं में झाँकती हुई दिख जाती है-
चूल्हे की वर्षगाँठ मना रही भूख
कितने दिन कट गए धुआँ पीते
कितने ही बिना जले दिन बीते
रोटियों पर मानचित्र बना रही धूप।
चीखते सवाल मौन हो जाएँ
सिसकते रोते जवाब सो जाएँ
थपकी दे लोरियाँ सुना रही भूख।
चूल्हे की वर्षगाँठ मना रही भूख।
-रामानुज त्रिपाठी
मेहनत करने वाले की मेहनत के फल से कोई अपना पेट भरने के लिए उसकी कमाई छीन ले वहाँ तक तो ठीक है पर यहाँ तो कुछ और ही हो रहा है और सब चुप हैं-
एक आदमी रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी सेंकता है
एक तीसरा आदमी है
जो न रोटी बेलता है
न रोटी सेंकता है
सिर्फ़ रोटियों से खेलता है
मैं पूछता हूँ कि
यह तीसरा आदमी कौन है?
मेरे देश की संसद मौन है।
धूमिल
इन्हीं सब स्थितियों को देख-देखकर कवि नववर्ष की शुभकामनाएँ केवल शहरों तक ही सीमित नहीं रखता, उसकी दृष्टि गाँव तक जाती है। उसे गाँव का मजदूर, किसान, चूल्हा, चक्की और तमाम लोकतव याद आते हैं जिनकी वजह से तथाकथित सभ्य दुनिया के पेट को दाना मिल पाता है। फिर भला इन्हें शुभकामनाएँ क्यों न दी जाएँ। इस्वी संवत को गांवों तक पहुंचाने वाले कवियों में सर्वेश्वर दयाल सक्सेना शायद पहले कवि हैं। वे नव वर्ष मनाते समय जब शहर को शुभकामना देते हैं, ग्रीटिंग कार्ड लिखते हैं तो गांवों को याद करना नहीं भूलते। भारतीय इतिहास का यह वह समय था जब गांव शहरों की ओर मुड़ रहे थे और शहरी संस्कृति वहां तक पहुंचना शुरू हो गई थी। वे कहते हैं-
खेतों की मेडों पर धूल-भरे पाँव को,
कुहरे में लिपटे उस छोटे-से गाँव को,
नये साल की शुभकामनाएँ!
जाते के गीतों को, बैलों की चाल को,
करघे को, कोल्हू को, मछुओं के जाल को,
नये साल की शुभकामनाएँ!
इस पकती रोटी को, बच्चों के शोर को,
चौंके की गुनगुन को, चूल्हे की भोर को,
नये साल की शुभकामनाएँ!
-सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
बीसवीं से इक्कीसवीं सदी तक आते आते दुनिया ने अपना चोला तेज़ी से बदला है। जहाँ पुरानी कविता में भोलापन और प्रकृति से निकटता देखने को मिलती है वहीं नयी कविता में औद्योगिक विकास और उसकी विभीषिका में पिसते ग़रीब मजदूर का चित्रण मिलता है। महानगरीय निर्माण और विकास के बिगुल के साथ खड़ी गरीबी की छोटी सिसकी का मुखर शब्द सुना जा सकता है डा अशोक चक्रधर की इन पंक्तियों में-
सोचते दिमाग़ों को नापती निगाहों को
गारे सने हाथों को डामर सने पाँवों को
उन सबको जिन्होंने
सड़क इमारतें बनाई कमाल की
शुभकामनाएँ नये साल की
उनको जो पता नहीं कब आए कब गए
फ्लाईओवर बनाते हुए दब गए
जिनके परिवारों को चिंता है
रोटी की दाल की
शुभकामनाएँ नये साल की
-अशोक चक्रधर
 मजदूर वर्ग के आंदोलन को चित्रित करने और उसका समर्थन करने वाली भी कुछ कविताएँ नए साल के संदर्भ में मिलती हैं। उनकी आवाज में आवाज़ मिला कर उनके विकास की कामना करने वाली व शोषण के विरुद्ध खड़ी होने वाली इसी तरह की एक  आवाज़ है कृष्ण मोहन की आप कहते हैं-
नयनो में नव उत्साह लिए नंगों भिखमंगो की होली
शोषक जग के प्रति बोल रही कुछ-कुछ परिवर्तन सी बोली
मानव जीवन है परिवर्तन परिवर्तन है उत्कर्ष सखे!
आया है नूतन वर्ष सखे!
-कृष्ण मोहन
नववर्ष की खुशियाँ अमीरों के घरों मे तो खूब जाती हैं पर ग़रीबो के छप्पर में और ग़रीबी ही बढ़ा देती हैं। ग़रीबों को नये वर्ष का अर्थ भी पता नहीं होता। उन्होंने तो सुना भर है कि नया वर्ष हर साल आता है-
दादी कहती है
कि नया साल जब-जब आता है
महँगाई की फुटवॉल को
थोड़ा और फुला जाता है।
ग़रीबी की चादर में
एक पैबंद और लगाकर
भ्रष्टाचार का प्रमोशन कर जाता है।
-डॉ. जगदीश व्योम
कहते हैं कि ग़रीब का बच्चा बचपन देखे बिना ही सयाना हो जाता है और वह भूख की जुगाड़ का गुणाभाग बचपन में ही सीख लेता है। यही उसकी विवशता है और भूख की यही अनिवार्य आवश्यकता है-
वह बेच रहा था
नव-वर्ष के नये गुब्बारे,
खड़ा सड़क किनारे,
करता जीवन यापन-
इसी के सहारे।
उसी से पूछ लिया
इस उत्सव का अर्थ
वह बोला-
''साब, यह तो आप लोगों का
है खिलवाड,
करता है कोई मस्ती
और कोई कर रहा बस
पेट की भूख का जुगाड़!
-सुमन कुमार घई
आधुनिक युग की तेज़ भागदौड़ में कुछ नवीन प्रवृत्तियाँ आम आदमी के जीवन में आई हैं जैसे निराशा, हिंसा घृणा। ऐसी अवस्था में प्रेम और खुशियों की ज़रूरत पहले से कहीं ज़्यादा महसूस की जाने लगी है। यही कारण है कि आज का कवि नये साल का वर्णन करते हुए इन्हें याद रखता है।

काट निराशा का अँधियारा, नया एक संसार बसाएँ
हिंसा घृणा द्वेष भय त्यागें, स्नेह प्यार का दीप जलाएँ
सबके घर आँगन में बरसे खुशियों की बरसात!
नया वर्ष लेकर आया है सुंदर नवल प्रभात
- गिरीशचंद्र श्रीवास्तव
जाति, धर्म और भेदभाव जैसी भावनाओं का महत्त्व आधुनिक जीवन में समाप्त हो चुका है। इन सब से विपरीत आधुनिक युग की एक महान प्रवृत्ति 'समानता की भावना' के पक्ष में कवि कहता है-
जाति-धर्म की खड़ी शिलाएँ, गल-गल पिघल स्वयं बह जाएँ।
भेद-भाव की चिर प्राचीरें, एक-एक कर सब ढह जाएँ।
घृणा-द्वेष के मरुथल-मरुथल प्रणय-सुमन खिल उठें अभय हो
नया वर्ष शुभ मंगलमय हो!
- प्रेमचंद्र सक्सेना 'प्राणाधार'
नए साल पर नए संकल्प लेने की परंपरा भले ही विदेशी हो लेकिन आज भारत में उसकी लोकप्रियता खूब है। संकल्प लेना, उसको निभाना या तोड़ देना यह सब व्यक्तिगत बातें हो सकती हैं पर आमआदमी के जीवन में नए साल पर संकल्प लेने की बात का याद आ जाना इस कविता में सुंदरता से व्यक्त हुआ है।
हर वर्ष नये वर्ष की सुबह
लेता हूँ नये संकल्प
नये वर्ष में बदल लूँगा स्वयं को
हो जाऊँगा और भी विनम्र
झुकने का अभ्यास करूँगा
लोगों से मिलूँगा अत्यधिक प्रेम से
मुझ में जो भरा है विष
पी जाऊँगा उसे, चेहरे पर
चिपका लूँगा स्थाई मुस्कान
व्यवहारिक आदमी की तरह।
- गोविंद माथुर
आम आदमी भी आज सुबह-सुबह अख़बार की सुर्खियाँ पढ़ने के बाद अपनी दिनचर्या शुरू करता है। लेकिन अख़बार के हर पन्ने पर भय और आतंक ही दिखाई देता है। दुनिया इतनी भी ख़राब अभी नहीं हुई है जितनी कि हम उसे प्रचारित कर रहे हैं। अभी बहुत कुछ अच्छा भी है हमारे समाज में, हमारे परिवेश में लेकिन हम तो बुराई देखने के ही अभ्यस्त हो चुके हैं। अख़बारों ने भय का जो माहौल बना रखा है वास्तव में वैसा है नहीं-
आज सारे दिन बाहर घूमता रहा
और कोई दुर्घटना नहीं हुई।
आज सारा दिन लोगों से मिलता रहा
और कहीं अपमानित नहीं हुआ।
आज सारे दिन सच बोलता रहा
और किसी ने बुरा नहीं माना।
आज सबका यकीन किया
और कहीं धोखा नहीं खाया।
और सबसे बड़ा चमत्कार तो यह
कि घर लौटकर मैंने किसी और को नहीं
अपने ही को लौटा हुआ पाया।
-कुँवर नारायण
यदि यही कार्य अख़बार भी करने लगे तो कितना अच्छा हो। नववर्ष पर कवि की यह भी आकांक्षा है। अख़बारों में बुरा कम लिखा जाए और अच्छा अधिक रहे-
दस्तक दे रहा है अख़बार
मुस्करा रहा है पहली बार
आज उसके अंदर
बुरा कम अच्छा ज़्यादा है
ये सुबह तुम्हारी है
-प्रदीप मिश्रा
नये वर्ष को जिस अंदाज़ में धूमधाम से मनाने का चलन चल पड़ा है वह उपभोक्तवाद की देन है। जितना बड़ा आयोजन होगा, जितनी चमक-दमक होगी उतना ही माल बिकेगा। इसलिए नववर्ष के समारोहों को इस तरह प्रायोजित किया जाता है कि अमीर आदमी जेब से पैसा निकालने के लिए उतावला हो उठे और आम आदमी देखा-देखी खर्च करने को विवश हो जाए भले ही उसे उधार लेना पड़े। उधार देने के लिए व्यापारी तैयार बैठे हैं फिर देर किस बात की-
छुट्टियों का मौसम है, त्योहार की तैयारी है
रौशन हैं इमारतें, जैसे जन्नत पधारी है
खुश हैं ख़रीदार, और व्यस्त व्यापारी हैं
खुशहाल हैं दोनों, जबकि दोनों ही उधारी हैं
- राहुल उपाध्याय
 महानगरीय व्यस्तता ने सांसारिक समृद्धि और सुविधाएँ तो जुटाई हैं लेकिन उदासी और अकेलेपन का ऐसा साम्राज्य भी ताना है कि इंसान नये साल पर भी खुले दिल से खुश नहीं हो पाता।
लो!
फिर एक नया साल चला आया।
बासी गुलदस्ते-सा
फेंक दिया कल
पिछला साल
यादों के कूडेदान में।
डूब गया सूरज
फिर तीन सौ पैंसठ बार
चढ़ने उतरने को।
- संदीप जैन
आज का परिवेश ऐसा है कि जहाँ देखो वहीं लोग परेशान हैं। उनके बीच कब, कहाँ और क्या हादसा हो जाए किसी को कुछ पता नहीं। आतंकवाद का दानव जगह-जगह अपना दाँव लगाए बैठा है-
हर तरफ़ बारूद का मौसम, कहाँ जाकर रहें,
आदमी भी हो गया है बम, कहाँ जाकर रहें।
गावँ में पहुँचे, वहाँ भी आग के चर्चे मिले
धूप के अख़बार, उठती धूल के पर्चे मिले
हर गली हर मोड़ पर, कुछ चोर या डाकू मिले
लाठियाँ उठती हुईं, चलते हुए चाकू मिले।
-डॉ. कुँअर बेचैन
ऐसे माहौल में भविष्य का क्या पता, इसलिए क्यों न आज थोड़ी ख़ुशियों के साथ कुछ पल गुज़ार लिए जाएँ-
तुम सच कहते हो-
कल किसी आतंकवादी बम से
आसमान फट पड़ेगा
तो मेरी फटी कमीज़ के तार-तार से
आसमाँ को भी सी दूँगा
पर आज मेरे दिल की नसें मत चिरने दो
यारों मुझे साल मुबारक कर लेने दो
-हरिहर झा
संसार से भय और आतंक को तो हमें मिलकर दूर करना ही होगा। नये वर्ष के साथ जो संकल्प हम कर रहे हैं उनमें आतंक को दूर करना भी हमारा लक्ष्य है। यदि सब मिलकर यह संकल्प करें और प्रयास करें तो वह दिन दूर नहीं जब हमारा परिवेश आतंक से मुक्त होकर शांति के दीप प्रज्ज्वलित कर सके-
दुनिया से आतंक मिटाएँ
सभी शांति के दीप जलाएँ
आतंक जग में जो फैलाते
उनके कहीं न मिले सहारा
स्वागत है नव वर्ष तुम्हारा
-शरद आलोक
इलेक्ट्रानिक संसाधन आज के युग की रोज की ज़रूरतों में शामिल हैं। ईमेल को विषय बनाकर लिखी गई सरदार तुकतुक की इस कविता में व्यंग्य का चुटीला प्रदर्शन देखा जा सकता है।
'विश' तो मैं आपको पहली को भी कर सकता था
शुभ वचनों से आपका मन भर सकता था।
पर जानते हैं क्यों नहीं किया?
क्यों कि पहली को तो सभी अभिनंदन करते हैं।
आप का मेल बाक्स शुभकामनाओं से भरते हैं।
पर बेचारा मेल बाक्स इतना लोड कहाँ ले पाता है।
किसी का संदेश पहुँचाता है।
किसी का नहीं भी पहुँचाता है।
सरदार तुकतुक
कभी कभी आधुनिकता से ऊब कर दूर प्रकृति की ओर पुनः उन्मुख होने की भावना भी हमारे मन के किसी कोने से आकर अपनी बात कहलवा देती है कि प्रकृति का भी अभिनंदन कर-
यह पिकनिक-पार्टी-हाय-हलो
तुझको क्या देगा
कुछ आगे की भी तैयारी कर।
नववर्ष की प्रातिभ नवप्रभा भी
उसका हर प्रभांश
हर पल हर जन से
क्षिति-जल-
पावक-गगन-समीरमय
अभिनंदन रही है माँग।
प्रकृति का भी अभिनंदन कर।
-विनोद कुमार
प्रकृति मुक्त हस्त से खुशियाँ लुटाती रहे तभी मानव सुखी रह सकता है-
फूलों से शोभित पल छिन, राह कभी ना लगे कठिन
सुबह स्फूर्ति को लेकर आए, दिवस धूप से निखर नहाए
शामों को विश्राम सजाए, मित्रों को जलपान लुभाए
मनोकामनाएँ हो पूरी, नये साल का शुभ दुलार है
-पूर्णिमा वर्मन
हिंदी का वैश्वीकरण होने से नये साल के प्रकृति चित्रण में विदेशी प्रकृति का प्रभाव भी देखने को मिल रहा है-
सर्द रातों की एक हवा जागी
और बर्फ़ की चादर ओढ़
सुबह के दरवाज़े पर दस्तक दी उसने
उनींदी आँखों से, सुबह की अँगड़ाई में
भीगी ज़मीन से ज्यों फूटा एक नया कोंपल
नये जीवन और नयी उमंग
नयी खुशियों के संग
-मानोशी चैटर्जी
सुनामी और विश्वशांति के प्रति चिंता कवियों की कविताओं का मुख्य विषय रहा है। कवि का दृष्टिकोण बहुत व्यापक होना चाहिए, उसके लिए तो समूची मानवता एक समान है। सब सुखी रहें कवि तो यही कामना करता है अपनी कविता में। नववर्ष की कविताओं में विश्वशांति की कामना कवि करते हुए दिखते हैं-
सिंधु नहीं लाँघे मर्यादा जीवन को न सताए बाधा
रह जाए सत्कार्य न आधा नवल हर्ष शुभ हो।
हर अंतर से दूर भ्रांति हो हर आनन पर नव्य क्रांति हो
अब न हताहत विश्व-शांति हो नव संघर्ष शुभ हो
- प्रो हरिशंकर आदेश
कवि नववर्ष की कविताओं में सुख-समृध्दि और मानव कल्याण की ही बात नहीं करता है वह यह भी कामना करता है कि कवि विपरीत समय में भी अपने कवि धर्म से विचलित न हों। भले ही कवि सृजन न करे लेकिन ऐसा सृजन कदापि न करे जिससे लोकहित न हो। कलम किसी और के इशारे पर न चले, कवि सम्मेलनों में सस्ते मनोरंजन के लिए कविताएँ न लिखे, अमीरों और राजनीति के तलुवे चाटने न पहुँच जाए। कलम जब भी उठे ध्वंस के नहीं बल्कि सृजन के गान गाए-
          कलम बिकने नहीं पाए, भले खामोश हो जाए
          कलम जब-जब उठे तब-तब सृजन के गान ही गाए
          कलम ज़िंदा रहे सबकी कलम हो साधना मेरी।
          नये नव वर्ष तुम आओ तुम्हें शुभकामना मेरी!
                                        -कमलेश भट्ट कमल

-डॉ० जगदीश व्योम
बी-12ए / 58 ए
सेक्टर-34, नोएडा 
पिन कोड-201301

हिन्दी काव्य साहित्य में ग्रीष्म ऋतु

-डॉ0 जगदीश व्योम

ग्रीष्म का आतप बढ़ते ही चहल–पहल कम हो जाती है।वृक्षों के साथ हमारी निकटता बढ़ जाती है‚ वृक्ष हमें जीवनदाता से प्रतीत होने लगते हैं।लोग घरों में कैद होने लगते हैं।ऐसे में ग्रीष्म की अनुभूति का एक बड़ा हिस्सा तो पसीना बनकर ही निकल जाता है फिर भी कुछ रह जाता है जिसे कविताओं के माध्यम से अभिव्यक्त किया जाता रहा है।वसन्त और पावस की तुलना में ग्रीष्म पर कम कविताएँ लिखी गई हैं।ग्रीष्म की अभिव्यक्ति सभी प्रकार की कविताओं में मिलती है चाहे वे बाल कविताएँ हो या प्रौढ़ कविताएँ।अधिकांशतः ग्रीष्म से उत्पन्न सभी स्थितियों को प्रतीकों में प्रयुक्त किया है परन्तु अनेक कविताओं में अभिधा में भी इनका प्रयोग देखने को मिलता है।रीतिकाल में तो ऋतु वर्णन पर न जाने कितना श्रेष्ठ और विषद साहित्य लिखा गया है।आधुनिक साहित्य में भी ग्रीष्म पर केन्द्रित कविताएँ खूब लिखी जा रही हैं।कुछ कविताएँ जिनमें ग्रीष्म के विविध क्षणों की अनुभूति कवियों ने की है—
ग्रीष्म की धधकती धूप साधन सम्पन्न लोगों के लिए तो परेशानी की बात नहीं है क्योंकि उन्हें कौन सा धूप में निकलना है‚ घर बातानुकूलित बाहर जाने के लिए गाड़ी बातानुकूलित लेकिन गरीब रामू क्या करे अखबार नहीं बेचेगा तो भूखे पेट से क्या कहकर उसे समझाएगा—
धधकती धूप में रामू खड़ा है
बेचता अखबार जिसमें बड़े सौदे छप रहे हैं।
—रघुवीर सहाय
सूरज हमारी पृथ्वी पर जीवन बनाए रखने के लिए अनिवार्य है परन्तु उसका अतिशय ताप हमारे मन में झुँझलाहट ही पैदा करता है।डॉ0 रामदरश मिश्र की कविताओं में ग्रीष्म के सूर्य को कष्टों को प्रतीक बनाकर प्रस्तुत किया गया है—
किसने बैठा दिया है मेरे कंधे पर सूरज
एक जलता हुआ असह्य बोझ कब से ढो रहा हूँ्र
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मैं पिघलती धूप–सा फैलने लगता हूँ अनेक अंतरालों में।
—डॉ0 रामदरश मिश्र
ग्रीष्म की अनेक स्थितियाँ हमें जीवन की अन्य तल्ख सच्चाइयों को उकेरने की भाषायी शक्ति और ऊर्जा दे जाती हैं।हम अपनी मनःस्थितियों के लिए जब ग्रीष्मानुभूति का सहारा लेते हैं तो कविता प्रभावशाली हो जाती है—
कंठ प्यासा ओंठ सूखे
प्यास ही अपनी कहानी
रेत के सैलाब पाए
पर‚ न पाया बूँद पानी
प्यास की है रिक्त गागर‚ आस का जल–स्रोत गहरा
चिलचिलाती धूप है‚ और हम खड़े हैं बीच सहरा।
—आत्म प्रकाश नंदवानी ‘चक्रवर्ती’
यह सच है कि प्रत्येक व्यक्ति प्यासा है‚ कष्टों और चिन्ताओं की असहनीय घाम ने उसे व्याकुल कर दिया है।सिर पर जलती घाम‚ गहन बन‚ प्यास से व्याकुल हिरनी का दृश्य हमारे अन्दर करुणा या दया का भाव ही नहीं जगाते बल्कि इस दग्ध अनुभूति के भीतर हमें ले जाकर खड़ा कर देते हैं।सबकी अपनी–अपनी प्यास है अपनी–अपनी व्याकुलता है—
प्यासी हिरनी गहन वन‚ सिर पर जलती घाम।
भटके मेरी विकलता कब तक मेरे राम।।
भ्रमते हैं रवि शशि नखत‚ भरा गगन परिमाण।
अपनी–अपनी प्यास से‚ सबके व्याकुल प्राण।।
—डॉ0 रामसनेहीलाल शर्मा यायावर
जीवन का जब रास्ता लम्बा हो और कठिनाइयों के पड़ाव हों तो परेशानी तो होती ही है पर यह भी सच है कि कष्टों का सामना करने से ही व्यक्तित्व में निखार आता है।इस मायने में धूप हमारे जीवन की कुट सच्चाई है इसका आदर करना ही उचित होगा—
सूना लम्बा रास्ता‚ पग–पग रेत पहाड़।
तिल–तिल जलती धूप है‚ ऊँचे–ऊँचे ताड़।।
धूप नये तेवर लिये‚ आई मेरे द्वार।
मैंने सर माथे लिया‚ तेरा यह उपहार।।
—डॉ0 शैल रस्तोगी
हमारे जीवन में दुख और सुख आते जाते रहते हैं यही जीवन है‚ दुख के समय हम घबराएँ नहीं और सुख के समय अभिमानी न हो जाएँ इसलिए यह परिवर्तन होता रहता है।ग्रीष्म के आतप के उपरान्त तप्त व्योम के हृदय पर मेघों की माला सुशोभित हो जाती है।यह आशावादी दृष्टि ग्रीष्म का आतप हमें भी दे जाता है कि हम आशावादी रहें।महाप्राण निराला के शब्दों में—
जला है जीवन यह
आतप में दीर्घकाल
सूखी भूमि‚ सूखे तरु
सूखे सिक्त आल बाल
बन्द हुआ गुंज‚ धूलि
धूसर हो गए कुंज
किन्तु पड़ी व्योम–उर
बन्धु‚ नील मेघ–माल।
—सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला
बच्चों के लिए लिखी गई ग्रीष्म पर केन्द्रित कविताओं में गर्मी का अभिधेय अर्थ ही देखने को मिलता है।क्योंकि ये कविताएँ बालकों के मन की तरह सीधी‚ सरल‚ सहज और लयात्मक होती हैं जो ग्रीष्म का चित्र प्रस्तुत करती हैं—
कटते न लम्बे दिन काटे
जड़ती है गालों पर चाँटे
धरती पर दौड़ रही सरपट
गर्मी की धूप बड़ी नट–खट।
— — — —
फिर नभ से अंगारे बरसे
गर्मी के दिन आये हैं
मुश्किल हुआ निकलना घर से
गर्मी के दिन आये हैं ।
लम्बे–लम्बे ज्यों अजगर से
गर्मी के दिन आये हैं ।
—रामानुज त्रिपाठी
इसी प्रकार सूरज की भीषण गर्मी से व्याकुल एक बच्चा कितनी सहजता से अपनी स्वाभाविक भाषा में कह उठता है—
सूरज ने गर्मी फैलाई उइ दइया
काली पीली आँधी आई उइ दइया।।
सूरज की शक्ति का सही माने में आकलन ग्रीष्म में ही होता है‚ शीत ऋतु में तो बेचारा ठिठुरा‚ सिकुड़ा‚ प्रभाव हीन से नीलाकाश के कोने में दुबहा पड़ा रहता है।ग्रीष्म में वह नीलाकाश का सम्राट बन जाता है‚ उससे गर्मी कम करने की प्रार्थना कारने के सिवाय हम कर ही क्या सकते हैं।एक बच्चा गर्मी कम करने का निवेदन करते हुए कहता है—
सूरज दादाॐॐ
सूरज दादाॐॐ
थोड़ी गरमी कम कर दो
धरती जलने लगी तवे सी
थोड़ी गरमी कम कर दोॐॐ
पशु–पक्षी हैं कितने व्याकुल
तुम तो स्वयं देखते हो
सूख गए हैं ताल–तलैया
थोड़ी गरमी कम कर दोॐॐ
गरम–गरम लू दिन भर चलती
घर में कैद हो गए हम
मन करता है खेलूँ बाहर
थोड़ी गरमी कम कर दोॐॐ

पिकनिक की जब बात करुँ
तो‚ मम्मी कहती‚ गरमी है
क्यों इतने नाराज हो गए
थोड़ी गरमी कम कर दोॐॐ

क्या गलती हो गई? कि
दादाॐ ऐसे आँख दिखाते हो
कान पकड़ कर माँफी माँगू
थोड़ी गरमी कम कर दोॐॐ
—डॉ0 जगदीश ‘व्योम’
ग्रीष्म ऋतु का सबसे गरम समय होता है जेठ का महीना।जेठ दोपहरी में लू चल रही है‚ मार्ग पर चलना मुश्किल हो रहा है‚ पैरों में फफोले पड़ जाते हैं।ऐसा लगता है मानों आग अपने गोले छोड़ रही हो‚ यही सब कुछ जेठ में हमें दिखाई देता है।तभी तो कवि कह उठता है—
जेठ तपी धरनी मरु सी अरु लूह चली करि बंजरु टोला
छोड़ती छाँव ठिया अपनी उत पाँजरि होय हरो तन चोला
बाढ़तु ताय तमोगुन सो अरु पाँव परें मग माँहि फफोला
व्याकुल होंय चरा चरह इत आगि छुड़ावति आपन गोला।।
—रघुवीर सिंह अरविन्द
गर्मी की भीषण उमस से व्याकुल ग्रमीण बच्चे नदी पौखरों में कुद–कूदकर नहाते हैं और गर्मी से इस तरह पीछा छुड़ाते हैं—
गर्मी से व्याकुल हुए घर से आकर तंग
दूर नदी में कूदते बच्चे नंग धड़ंग।।
—नित्यगोपाल कटारे
गर्मी के प्रभाव से वृक्ष भी झुलस से गए हैं और सूर्य की किरणें तप कर लाल हो गई हैं—
“प्यासे प्यासे से खड़े‚ रूखे सूखे रूख
जेठ मास के तरनि से‚ तापी मयूख मयूख।।”
—जगदीश प्रसाद सारस्वत ‘विकल’
गर्मी की धूप और कुछ करे या न करे उत्साह भंग तो कर ही देती है—
“चिलचिलाती धूप
हर लेती रूप
झुलसाती अंग–अंग
करती उत्साह भंग”
—भास्कर तैलंग
गर्मी में शरीर से पसीना बहता है और प्यास अधिक लगती है परन्तु प्यास भी है कि बुझने का नाम ही नहीं लेती है।एक दृश्य देखें—
देहों के दरवाजे खोल रहा स्वेद
प्यासों को देख तृप्ति लौटती सखेद।
—गिरिमोहन गुरु
कवि जब ग्रीष्म के तपते सूर्य को निरखता है तो उसका कारण अपने हिसाब से खोजता हैं‚ सूर्य के लाल होने के पीछे कुछ तो कारण होगा लेकिन इसका प्रभाव यह हुआ है कि सब व्याकुल हैं।हवा पानी से रहित हो गई है‚ नीम की छाया भी अब छाया खोजने लगी है‚ नदी का जल कम हो गया है‚ ताल सूख गए हैं—
जाने क्या हो गया‚ कि सूरज इतना लाल हुआ।
प्यासी हवा हाँफती फिर–फिर पानी खोज रही
सूखे कण्ठ–कोकिला‚ मीठी बानी खोज रही
नीम द्वार का‚ छाया खोजे पीपल गाछ तलाशे
नदी खोजती धार कूल कब से बैठे हैं प्यासे
पानी–पानी रटे
रात–दिन‚ ऐसा ताल हुआ
—डॉ0 जगदीश व्योम
यही नहीं कि हम गरमी से केवल परेशान ही होते हैं बल्कि यह हमारी स्मृति में गहरअई तक पैठ बना लेती है और जब हम अपने गाँव घर से दूर होते हैं तो यही गरमी की यादें रह–रहकर हमारे मन में आती हैं—
गरमी की महकती
सुबह को साँसों में भरना
खस से टपकता खुशबू भरा
वो पानी कहाँ है ।
—सुमन कुमार घेई
गरमी से बहुत जल्दी परेशान होने का एक कारण यह भी है कि हम प्रकृति से एकदम कट गए हैं—
मई की उमस में
अपने छोटे से कमरे की
खिड़की और दरवाजों को दिन भर
मजबूती से बन्द रखा मैंने
ताकि लू कि चपेट में ना आ जाऊँ ॐ
—अजित कुमार
ग्रीष्म कितनी भी कष्टदायक क्यों न हो पर हम अच्छी तरह जानते हैं कि ग्रीष्म के कारण ही पानी बरसता है और हरियाली लौटकर आती है—
यह सब कुछ याद रहे
मौसम का साथ रहे
ग्रीष्म ऋतु भी जाएगी
फिर रहेगी प्रतीक्षा
अगले मौसम की
बहार की।
—अश्विन गांधी
गरीब मजदूर गरमी से दूसरों को बचाने के ल्एि दोपहरी में भी काम करते हैं।काश हम उनकी ओर भी ध्यान दे पाते। उषा चौधरी एक ऐसे ही दृश्य का चित्रण करते हुए कहती हैं—
ज़रा सी खिड़की खोल कर देखा
नीम के पेड़ के नीचे
दुबला पतला
आबनूसी रंग वाला बच्चा
तपती धरती में
नंगा पड़ा रो रहा है।
और
मां बाप औरों को
गरमी से बचाने के लिये
ख़स के पर्दे गूंथ रहे हैं।
—उषा चौधरी
धूप का वृक्षों की टहनियों और पत्तियों के बीच से छन–छनकर धरती पर आना दृष्टि का उत्सव है।ग्रीष्म की धूप का ऐसा ही एक मनभावन चित्रण करते हुए पूर्णिमा वर्मन कहती हैं—
झर रही है
ताड़ की इन उंगलियों से धूप
करतलों की
छांह बैठा
दिन फटकता सूप
बन रहे हैं ग्रीष्म के स्तूप।
—पूर्णिमा वर्मन
धूप कितनी ही तेज क्यों न हो कोई काम नहीं रुकेगा‚ यही संसार का नियम है।लोग धूप में बाहर निकलेंगे भी और पाँव के छालों को भी सहलाएँगे—
तेज धूप में आना जाना लगा रहेगा
पैरों के छाले सहलाना लगा रहेगा।
—ज्ञानप्रकाश विवेक
गरमी का प्रभाव गरीब और अमीर दोनों के लिए अलग तरह का होता है। अमीरों के तो कुत्तों के लिए भी ग्रीष्म के आतप से बचाव के उपाय हो जाते हैं पर गरीब के लिए—
गरमी की दोपहरी में
तपे हुए नभ के नीचे
काली सड़कें तारकोल की
अंगारे सी जली पड़ी थीं
छांह जली थी पेड़ों की भी
पत्ते झुलस गए थे
00000
कड़ी धूप से।
बड़े घरों के श्वान पालतू
बाथरूम में पानी की हल्की ठंड़क में
नयन मूंद कर लेट गए थे।
कोई बाहर नहीं निकलता
सांझ समय तक
—शकुंत माथुर

ग्रीष्म का सुरेन्द्र सुकुमार ने बहुत ही जीवन्त चित्र खींचा है—
ज्यों ही आंगन में पड़े जेठ धूप के पांव।
कोठे भीतर घुस गयी छोटी दुल्हन छांव।।
बड़ी दूर सब हो गये पानी पनघट छांव।
झुलस गये हैं दूब के नन्हें नन्हें पांव।।
—सुरेन्द्र सुकुमार

ग्रीष्म का यह आतप थोड़े दिन के लिए ही सही परन्तु सभी जीव जन्तुओं के लिए घोर तपस्या का काल खण्ड होता है।कहते हैं कि ग्रीष्म जितनी ताप छोड़ेगी पावस उतनी ही हरियाली बिखरायेगी।

—डॉ0 जगदीश व्योम