Saturday, December 31, 2016

हाइकु कविताओं में नया साल

                                  हाइकु कविताओं में नया साल

                                                                                   -डा॰ जगदीश व्योम

लो फिर आ गया नया साल, निरन्तरता का सूचक है नया साल । कुछ भी स्थिर नहीं है समूची सृष्टि में । सब चल रहे हैं, और निरन्तर चलते जा रहे हैं, कहाँ जा रहे हैं... किसी को कुछ पता नहीं। हम धरती पर चल रहे हैं, धरती अपने रास्ते पर चल रही है, जाने कब से लगाये जा रही है सूर्य के आस-पास चक्कर पर चक्कर, सूर्य महाराज किसी और की परिक्रमा किये जा रहे हैं। धरती ने अपना एक चक्कर पूरा किया कि हम मग्न हो गए कि लो नया साल आ गया।
उधर काल पुरुष किसी अलौकिक ग्रंथ के पृष्ठ दर पृष्ठ खोलता चला जा रहा है। एक पन्ना खुलता है बहुत हौले से जिसमें अंकित है एक नवगीत पूरी तीन सौ पैंसठ पंक्तियों का जिसे उकेरा है किसी अज्ञात रचनाकार ने । काल पुरुष इसे पढ़कर पलट देता है एक और नया पन्ना, न जाने कब से चल रहा है यह क्रम -
  लो चला वर्ष
नया पृष्ठ खोलेगा
काल पुरुष  
-शिवजी श्रीवास्तव
सबकी निगाहें प्रतीक्षारत हैं कि-
चीर के धुंध
आएगा नव वर्ष
उल्लास भरा  
-राजीव गोयल
पूरे हुये प्रतीक्षा के ये पल, आ गई उभर कर एक किरन और साथ में खींचकर ले आई नये साल का भारी भरकम ठेला-
साल का ठेला
खींचकर लाई है
नई किरन
-पूर्णिमा वर्मन
किरन केवल साल का ठेला ही खींचकर नहीं लायी है, वह नये संकल्पों की गठरी भी लायी है अपने साथ-
नव संकल्प
सूर्य किरन लाई
धरा मुस्कायी
-सीमा स्मृति
संकल्पों को पूरा करना है तो सोते से जागना भी होगा तभी संकल्प पूरे हो सकेंगे। धरती ने नये साल के रूप में फिर से अँगड़ाई ले ली है, और अब बारी हमारी है कि हम भी आलस को त्याग कर सजग हो जायें अपने कर्तव्य पालन के लिये-
नये साल ने
ले ली है अँगड़ाई
कली मुस्कायी
-ऋता शेखर मधु
और जब-जब धरती अँगड़ाई लेती है तब-तब नई सृष्टि का संचार होता है, आशाओं के अंकुर फूट पड़ते हैं-
अंकुर फूटा
नई आशाएँ लिये
शुभ स्वागत
-भावना सक्सेना
इन नवांकुरों का स्वागत करना है, इन्हें पल्लवित होने के लिए स्वस्थ परिवेश देना है तभी ये नवांकुर पल्लवित और पुष्पित हो सकेंगे। नित नवीनता के प्रति आकर्षण हमारी जन्मजात विशेषता है। कविता में भी नवीनता खोजने की ललक हमेशा से रही है, नयी काव्य विधाओं के रूप में, छन्द के रूप में, कथ्य के रूप में। इसी खोज का सुपरिणाम है दुनिया की सबसे छोटी कविता- हाइकु । हाइकु कविताओं में नये वर्ष की चर्चा होती रही है। इस नव वर्ष के बहाने भी कवि छन्दों में कुछ नया-सा, कुछ मीठा-सा रस घोल सकें ऐसी ही कामना अपने एक हाइकु में शिवजी श्रीवास्तव करते हुए कहते हैं-
नया बरस
छन्दों में घोलें कवि
मीठा रस
-शिवजी श्रीवास्तव
नये वर्ष में कुछ नया हो जो प्रासंगिक हो, ऐसे विचार जो उपयोगी नहीं रह गये हों उन्हें छोड़ देने में ही भलाई है-
नूतन वर्ष
तज जीर्ण विचार
अबकी बार
-ज्योतिर्मयी पन्त
भारतीय संस्कृति की एक विशेषता यह भी है कि यहाँ केवल अपने सुख के लिये प्रार्थना नहीं की जाती है यहाँ तो सबके सुखी जीवन के लिये दुआ माँगी जाती है-
नवीन वर्ष
सबके जीवन में
लाए उत्कर्ष
-प्रदीप कुमार दाश
 नये वर्ष का मानवीकरण भी खूब किया है कवियों ने, कभी उसे राजा कहा है तो कभी सन्त और कभी ऐसा पाहुन जो बार-बार आता रहता है-
पाहुन बन
घूम-घूम के आया
नवल वर्ष
-रमा द्विवेदी
कहते हैं कि वक्त न तो छोटा होता है और न बड़ा, हम अपनी मनःस्थिति के अनुरूप उसकी अनुभूति करते हैं, दुखी व्यक्ति के लिए साल इतना लम्बा हो जाता है कि काटे नहीं कटता और जिनके जीवन में सुख है उनके लिए साल के तीन सौं पैंसठ दिन कब फिसल जाते हैं पता ही नहीं चलता एकदम हथेली में थामे हुए रेत के समान-
फिसल गया
वक्त की हथेली से
रेत-सा साल
-नमिता राकेश
कभी लगता है कि नया साल चुपचाप नहीं आता उसके आने पर शोर होता है ठीक किसी पहाड़ी झरने के समान-
नव वर्ष भी
झरने-सा उतरा
शोर मचाता
-डॉ. सरस्वती माथुर
नये वर्ष में जन-जन के मन में नये-नये सपने जन्म लेते हैं-
स्वप्न धवल
ख्यालों-मुंडेरों सजे
वर्ष नवल
-विभा श्रीवास्तव
नववर्ष का पहला दिन किसी पवित्र ग्रंथ के पहले पृष्ठ के समान लगता है, निर्मल और पावन, हरदीप कौर सन्धु इस प्रथम पृष्ठ को धीरे से खोलने का आह्वान करते हुए कहती हैं-
  धीरे से खोलें
आओ नव वर्ष का
प्रथम पृष्ठ
-डॉ. हरदीप कौर सन्धु
नववर्ष के पृष्ठ को खोलने के बाद संकल्प लेना है कुछ वादों का कुछ इरादों का-
कुछ वादे हैं
बहुत इरादे हैं
नव वर्ष में
-प्रियंका गुप्ता
इन वादों और इरादों को जब हम पूरा कर लेते हैं तब खिलती है इरादों की धूप और फिर नये साल के रूप में उम्मीदों की यही धूप कुछ और संकल्पों की चाह लिये आ जाती है-
फिर से खिली
उम्मीदों वाली धूप
नए साल की
- जेन्नी शबनम
हर एक नया साल एक न एक दिन पुराना हो जाता है और उसके पास कुछ शेष बचता है तो वह है तमाम पुरानी यादें-
पुरानी यादें
पोटली में बांधता
साल पुराना
-अंजली शर्मा
ये पुरानी यादें कभी-कभी ऐसी विभीषिकाओं और आपदाओं को समेटे हुए होती हैं कि दिन जख्मी लगने लगते हैं और तारीखें लाल-
जख्मी से दिन
तारीखें हुयी लाल
साल का हाल
-सविता अशोक अग्रवाल
दुख और आपदाओं को सौगात में देकर जाने वाला साल नये वर्ष में कुछ अच्छा होने का वादा करके विदा होता है शायद यह दुख और त्रासदी उसे भी अच्छी नहीं लगती होगी तभी तो पुराने साल की रात दूब पर ओस के रूप में अपने आँसू टपका कर यही संकेत करती है पूर्णिमा वर्मन के इस हाइकु में इसे महसूस किया जा सकता है-
पुराना साल
रात ने किया विदा
दूब पे अश्रु
-पूर्णिमा वर्मन
कभी-कभी लगता है कि साल किसी बटोही के समान है जो एक पड़ाव पर रुकता है और जाते समय अपनी यादों की पोटली वहीं छोड़ कर चल देता है, यह बात अलग है कि यादों की ये पोटली सभी को अपनी-सी ही लगती है-
बटोही साल
छोड़ गया पोटली
यादों से भरी
-सुनीता अग्रवाल
भले ही जाने वाला हर साल दुख और संत्रास की पोटलियाँ छोड़ता रहता है फिर भी हर किसी को किसी अचीन्हें उल्लास की उम्मीद बनी ही रहती है, यही लगता रहता है दुख और त्रासदी के धुंध को चीर कर नव वर्ष की किरणें सबके जीवन में उल्लास भर देंगीं-
चीर के धुंध
आयेगा नव वर्ष
उल्लास भरा
-राजीव गोयल
नये साल के हाथों में बारह महीनों का बूढ़ा कलेण्डर सौंप कर पुराना साल विदा हो जाता है, उमेश मौर्य के हाइकु में यही भाव देखा जा सकता है-
सौंपता चला
बूढ़ा सा कलेण्डर
नूतन वर्ष
-उमेश मौर्य
एक पीढ़ी अपनी विरासत दूसरी पीढ़ी को सौंप कर विदा लेती है इसी तरह पुराना वर्ष भी अपनी खट्टी-मीठी विरासत को आने वाले नये साल को सौंप कर स्वयं अतीत बन जाता है, योगेन्द्र वर्मा के इस हाइकु में यही संदेश है-
साल पुराना
सौंपता विरासत
नये साल को
-योगेन्द्र वर्मा
वक्त का डाकिया मधु पत्र के रूप में नये वर्ष को लेकर आता है तो चारो ओर खुशी छा जाती है-
काल डाकिया
ले आया मधु पत्र
नये वर्ष का
-शिवजी श्रीवास्तव
आने वाले वर्ष के दिन, महीने कैसे होंगे इसका ताना-बाना पहले से ही काल रूपी जुलाहा बुनकर तैयार कर लेता है-
काल जुलाहा
बुनता ताना-बाना
नवल वर्ष
-ज्योतिर्मयी पन्त
वक्त के जुलाहे ने आने वाले वर्ष के ताने-बाने में क्या बुना है यह तो किसी को नहीं मालूम परन्तु उम्मीद यही रहती है कि सब कुछ अच्छा रहे, हमारा देश खुशहाल रहे, जन-जीवन सुखी रहे, चारो ओर सुख और शांति बनी रहे-
नूतन वर्ष
खुशहाल वतन
सौगात मिले
-शांति पुरोहित
संघर्ष हमारे जीवन का अभिन्न अंग है, बिना संघर्ष के आगे बढ़ना असम्भव है, नये साल में हर संघर्ष पर हमारी विजय होती रहे, सबके लिये ऐसी ही कामना करना एक रचनाकार का धर्म बन जाता है, अरुण आशरी के एक हाइकु में इसे देखा जा सकता है-
नूतन वर्ष
जीतें हर संघर्ष
मिले उत्कर्ष
-अरुण आशरी
सपने देखना और सपनों को साकार करने का प्रयास करना ही जीवन का दूसरा नाम है, नया वर्ष भी जन-जन के मन में अनगिनत सपनों का संचार करता है, सबको सिंदूरी सपने बाँट कर उन्हें साकार करने की मूक प्रेरणा भी देता है, त्रिलोक सिंह ठकुरेला के इस हाइकु में यही भाव दृष्टव्य है-
नये वर्ष में
बाँट दिये सबको
सिन्दूरी स्वप्न
-त्रिलोक सिंह ठकुरेला
दुख के बाद सुख और सुख के बाद दुख का क्रम चलता ही रहता है, बीते साल में होने वाली घटनाओं से दुखी होकर रात दिन रोते रहने से अच्छा है कि खुशियों की परिकल्पना करते हुये जीवन में हर्ष और उल्लास की आशा रखनी चाहिये, नये साल में निश्चय ही सब कुछ अच्छा ही अच्छा होगा हमें यही सकारात्मक सोच रखनी चाहिये-
गम न कर
गुज़रा बीता साल
आएगी ख़ुशी
-गुंजन गर्ग अग्रवाल
और दुख, कुण्ठा, संत्रास का यह कुहासा जो जन-जन के मन पर अप्रत्याशित रूप से छाया हुआ है, वह नये साल में दूर होगा और नये साल के नये सूर्य की नयी किरणें इस कुहासे को चीर कर सुख और शांति की नयी और ताजी धूप जन-जन को समान रूप से बाँट कर इस कुहासे को दूर कर सकेंगी यही कामना है-
कुछ कम हो
शायद ये कुहासा
यही प्रत्याशा
-डा॰ जगदीश व्योम

जापान के अठारहवीं शताब्दी के अद्भुत हाइकु कवि कोबायाशी इस्सा के हाइकु जापान के साहित्यिक इतिहास मे कुछ वैसा ही मुकाम रखते हैं जैसा हिंदुस्तान मे कबीर की साखियों का है। हाइकु के चार स्तंभों मे ’बाशो’, ’बुसोन’ और ’शिकि’ के साथ ही उनका नाम भी शामिल है। अपने जीवन काल मे कोई 20000 हाइकु लिखने वाले इस्सा की लोकप्रियता वक्त से संग बढ़ती ही गयी है। कोबायाशी इस्सा (1763-1827) का 64 साल का जीवन लगातार उथलपुथल से भरा रहा। नये साल पर इस्सा के कुछ हाइकु उनके जीवन की इसी उथल-पुथल का आईना हैं-
साल का पहला सपना
मेरे गाँव का घर
आँसुओं से धुला
-इस्सा

वक्त के आगे मानव जीवन असहाय है, इस्सा बीते वर्ष की अनुभूति को एक हाइकु में व्यक्त करते हुए कहते हैं-
लकड़ी उतराती पानी में
कभी इधर कभी उधर
खतम होता है साल
-इस्सा

गढ़ रही है
साल का पहला आकाश
चाय की भाप
-इस्सा
चाय यहाँ नये साल के उत्सव का भी एक पहलू है। एक मजेदार बात यह भी है कि कवि के तखल्लुस ’इस्सा’ का जापानी मतलब भी चाय-का-कप जैसा कुछ होता है।
शहरी गरीब इलाकों मे रहने की जगह की तंगी अपने हिस्से की जमीन ही नही आसमान को भी छोटा कर देती है, इस्सा को इसका अच्छा तजुर्बा रहा था-
बाड़ से बँधा
कुल तीन हाथ चौड़ा
साल का पहला आकाश
-इस्सा
साल के पहले दिन सूर्य को देखकर इस्सा कहते हैं-
गोदाम के पिछवाड़े
तिरछा चमकता है
साल का पहला सूरज
-इस्सा
अपने घर की दुर्दशा के बहाने इस्सा अपनी आर्थिक खस्ताहाली पर भी व्यंग्य करने से नहीं चूकते हैं-
थोक मे अभिनंदन करता
साल की पहली बारिश का
टपकता हुआ घर
-इस्सा
इस्सा के तीखे हास्यबोध और जिंदगी के प्रति फ़क्कडपन का बेहतरीन उदाहरण है, जहाँ टूटे घर में भी वे ऐसी सकारात्मकता खोज लेते हैं कि जिंदगी से कोई शिकायत न हो-
दीवार मे छेद
कितना सुंदर तो है
मेरे साल का पहला आकाश
-इस्सा

-डा० जगदीश व्योम
बी-12ए / 58ए
धवलगिरि, सेक्टर-34
नोएडा - 201301






Tuesday, May 15, 2012

मुक्तछन्द या छन्दमुक्त

डा० जगदीश व्योम ---

हिन्दी साहित्य में "मुक्तछन्द" महाप्राण निराला की देन है। कविता में छन्द का बड़ा महत्व है। छन्द का आशय है अनुशासन अर्थात कविता में अनुशासन हो वही कविता कविता है। जिस कविता में छन्द नहीं हो अर्थात कोई अनुशासन नहीं हो उसे कविता नहीं कहा जा सकता, गद्य कह सकते हैं उसे। लेकिन एक समय हिन्दी साहित्य में ऐसा भी आया जब कविता में छन्द पर इतना अधिक ध्यान दिया जाने लगा कि कविता में छन्द तो रहा पर कविता गायब सी होने लगी। निराला जी ने तब "मुक्तछन्द" की घोषणा की अर्थात कविता को पारम्परिक छन्दों के बंधन से मुक्ति दिलाई। "छन्दमुक्त" शब्द हिन्दी कविता के लिए नहीं आया है, यह किसी भ्रम के कारण प्रयुक्त होने लगा, सही शब्द "मुक्तछन्द" है।
अर्थात कविता को किसी छन्द विशेष में ही नहीं लिखना है बल्कि आप अपने अनुरूप छन्द में कविता लिख सकते हैं पर उसमें कोई लय, प्रवाह अवश्य रहे। यदि लय और प्रवाह या अन्तवर्ती लय कविता में नहीं है तो उसे कविता नहीं कह सकते। निराला जी की किसी भी कविता में लय और प्रवाह देखा जा सकता है। जैसे, निराला जी की एक कविता है--

वह आता
दो टूक कलेजे कस करता
पछताता पथ पर आता
पेट पीठ दोनों मिलकर हैं एक
चल रहा लकुटिया टेक
मुट्ठी भर दाने को
भूख मिटाने को
मुँह, फटी पुरानी झोली का फैलाता
दो टूक कलेजे के करता
पछताता पथ पर आता
-(सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला)

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शशिकान्त गीते --

मेरी जानकारी में मूलरूप से मुक्तछंद में एक छांदसिक लय होती है मगर वह पारम्परिक छंद नहीं होता. यह लय बाह्य भी होती है. इसके विपरीत मुक्तछंद विचार या अर्थ की अंतर्वर्ती लय पर केन्द्रित होता है. कह नहीं सकता मेरी यह जानकारी सही भी है या नहीं.

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अमिताभ त्रिपाठी---

 डा० व्योम जी,  आपने चर्चा छेड़ी है तो मुझे भी कुछ कहने का मन हुआ। प्रायः लोग मुक्तछन्द और छन्द मुक्त को एक ही समझ लेते हैं। मेरे मित्रों के बीच भी इस विषय पर चर्चा हुई है। मुक्तछन्द की परम्परा में पहला नाम निराला का आता है और यदि मैं भूल नहीं कर रहा हूँ तो उन्होंने ही इस शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग किया है। "लिखता अबाध गति मुक्त-छन्द, पर सम्पादकगण निरानन्द...." (सरोज स्मृति)। ध्यान देने योग्य है कि विशेषण-विशेष्य की दृष्टि से भी देखें तो मुक्त-छन्द में भी छान्दसिकता संलिप्त है लेकिन इसकी प्रकृति मुक्त है। सम्भवतः यह मुक्ति तत्कालीन शास्त्रीयता से रही होगी। उस पुरातनपन्थी अवधारणा से जिसमें कुछ निश्चित छ्न्दों (मीटर्स) में ही रचना करने को कवित्व माना जाता था। उस जड़ता को तोड़ने के लिये मुक्तछन्द का आविष्कार या विधान हुआ। किन्तु क्योंकि छन्द एक प्रकार का शब्दानुशासन या लयानुशासन है इसलिये मुक्तछन्द कविताओं में भी वह अनुशासन बना रहता है। निराला की प्रभूत रचनायें इसका उदाहरण हैं।
अब कब और किस सुविधा के अन्तर्गत मुक्तछन्द उलट कर छन्दमुक्त हो गया यह शोध का विषय नहीं रहा। क्योंकि नई कविता के बाद अकविता का भी आन्दोलन चला और ऐसे पूर्वाग्रह भी देखने को मिले जो स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होने वाले अनुप्रासों को भी सायास तोड़ देते थे कि कहीं इससे कविता? में छन्द की गन्ध न आ जाय।
अस्तु छन्दमुक्त सृजन मेरी दृष्टि में एक अनुशासनहीन रचना प्रक्रिया है जिसमें गद्य को छद्मरूप से कविता का आकार दिया जाता है। विचारवान लोग इसे वैचारिक कविता कहते हैं जिससे ऐसा लगता है शेष रचनायें विचारहीन या अवैचारिक होती हैं।
यह सत्य है कि का्व्य को परिभाषित करना अत्यंत कठिन है लेकिन उसका अभास पाना उतना कठिन नहीं है। गद्य में भी काव्य रचना हो सकती है। आचार्य चतुरसेन का गद्यकाव्य दृष्टव्य है। अतः मुक्तछन्द गद्यकाव्य का ही एक छद्मनाम है मेरे मत से। परन्तु संकोच के साथ लिखना पड़ रहा है कि छ्न्दमुक्त रचानाओं में काव्य के भी दर्शन दुर्लभ होते जा रहे हैं, चुट्कुलों को छोड़ कर जिसे हास्यरस के कारण काव्य की प्रतिष्ठा मिल जाती है।
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Thursday, June 07, 2007

हिन्दी काव्य साहित्य में ग्रीष्म ऋतु


ग्रीष्म का आतप बढ़ते ही चहल–पहल कम हो जाती है।वृक्षों के साथ हमारी निकटता बढ़ जाती है‚ वृक्ष हमें जीवनदाता से प्रतीत होने लगते हैं।लोग घरों में कैद होने लगते हैं। ऐसे में ग्रीष्म की अनुभूति का एक बड़ा हिस्सा तो पसीना बनकर ही निकल जाता है फिर भी कुछ रह जाता है जिसे कविताओं के माध्यम से अभिव्यक्त किया जाता रहा है।वसन्त और पावस की तुलना में ग्रीष्म पर कम कविताएँ लिखी गई हैं।ग्रीष्म की अभिव्यक्ति सभी प्रकार की कविताओं में मिलती है चाहे वे बाल कविताएँ हो या प्रौढ़ कविताएँ।अधिकांशतः ग्रीष्म से उत्पन्न सभी स्थितियों को प्रतीकों में प्रयुक्त किया है परन्तु अनेक कविताओं में अभिधा में भी इनका प्रयोग देखने को मिलता है।रीतिकाल में तो ऋतु वर्णन पर न जाने कितना श्रेष्ठ और विषद साहित्य लिखा गया है।आधुनिक साहित्य में भी ग्रीष्म पर केन्द्रित कविताएँ खूब लिखी जा रही हैं।कुछ कविताएँ जिनमें ग्रीष्म के विविध क्षणों की अनुभूति कवियों ने की है—
ग्रीष्म की धधकती धूप साधन सम्पन्न लोगों के लिए तो परेशानी की बात नहीं है क्योंकि उन्हें कौन सा धूप में निकलना है‚ घर बातानुकूलित बाहर जाने के लिए गाड़ी बातानुकूलित लेकिन गरीब रामू क्या करे अखबार नहीं बेचेगा तो भूखे पेट से क्या कहकर उसे समझाएगा—
धधकती धूप में रामू खड़ा है
बेचता अखबार जिसमें बड़े सौदे छप रहे हैं।
—रघुवीर सहाय

सूरज हमारी पृथ्वी पर जीवन बनाए रखने के लिए अनिवार्य है परन्तु उसका अतिशय ताप हमारे मन में झुँझलाहट ही पैदा करता है।डॉ0 रामदरश मिश्र की कविताओं में ग्रीष्म के सूर्य को कष्टों को प्रतीक बनाकर प्रस्तुत किया गया है—
किसने बैठा दिया है मेरे कंधे पर सूरज
एक जलता हुआ असह्य बोझ कब से ढो रहा हूँ

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मैं पिघलती धूप–सा फैलने लगता हूँ अनेक अंतरालों में।
—डॉ0 रामदरश मिश्र

ग्रीष्म की अनेक स्थितियाँ हमें जीवन की अन्य तल्ख सच्चाइयों को उकेरने की भाषायी शक्ति और ऊर्जा दे जाती हैं।हम अपनी मनःस्थितियों के लिए जब ग्रीष्मानुभूति का सहारा लेते हैं तो कविता प्रभावशाली हो जाती है—
कंठ प्यासा ओंठ सूखे
प्यास ही अपनी कहानी
रेत के सैलाब पाए
पर‚ न पाया बूँद पानी
प्यास की है रिक्त गागर‚ आस का जल–स्रोत गहरा
चिलचिलाती धूप है‚ और हम खड़े हैं बीच सहरा।
—आत्म प्रकाश नंदवानी ‘चक्रवर्ती’

यह सच है कि प्रत्येक व्यक्ति प्यासा है‚ कष्टों और चिन्ताओं की असहनीय घाम ने उसे व्याकुल कर दिया है।सिर पर जलती घाम‚ गहन बन‚ प्यास से व्याकुल हिरनी का दृश्य हमारे अन्दर करुणा या दया का भाव ही नहीं जगाते बल्कि इस दग्ध अनुभूति के भीतर हमें ले जाकर खड़ा कर देते हैं।सबकी अपनी–अपनी प्यास है अपनी–अपनी व्याकुलता है—
प्यासी हिरनी गहन वन‚ सिर पर जलती घाम।
भटके मेरी विकलता कब तक मेरे राम।।
भ्रमते हैं रवि शशि नखत‚ भरा गगन परिमाण।
अपनी–अपनी प्यास से‚ सबके व्याकुल प्राण।।
—डॉ0 रामसनेहीलाल शर्मा यायावर

जीवन का जब रास्ता लम्बा हो और कठिनाइयों के पड़ाव हों तो परेशानी तो होती ही है पर यह भी सच है कि कष्टों का सामना करने से ही व्यक्तित्व में निखार आता है।इस मायने में धूप हमारे जीवन की कुट सच्चाई है इसका आदर करना ही उचित होगा—
सूना लम्बा रास्ता‚ पग–पग रेत पहाड़।
तिल–तिल जलती धूप है‚ ऊँचे–ऊँचे ताड़।।
धूप नये तेवर लिये‚ आई मेरे द्वार।
मैंने सर माथे लिया‚ तेरा यह उपहार।।
—डॉ0 शैल रस्तोगी

हमारे जीवन में दुख और सुख आते जाते रहते हैं यही जीवन है‚ दुख के समय हम घबराएँ नहीं और सुख के समय अभिमानी न हो जाएँ इसलिए यह परिवर्तन होता रहता है।ग्रीष्म के आतप के उपरान्त तप्त व्योम के हृदय पर मेघों की माला सुशोभित हो जाती है।यह आशावादी दृष्टि ग्रीष्म का आतप हमें भी दे जाता है कि हम आशावादी रहें।महाप्राण निराला के शब्दों में—
जला है जीवन यह
आतप में दीर्घकाल
सूखी भूमि‚ सूखे तरु
सूखे सिक्त आल बाल
बन्द हुआ गुंज‚ धूलि
धूसर हो गए कुंज
किन्तु पड़ी व्योम–उर
बन्धु‚ नील मेघ–माल।
—सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला

बच्चों के लिए लिखी गई ग्रीष्म पर केन्द्रित कविताओं में गर्मी का अभिधेय अर्थ ही देखने को मिलता है।क्योंकि ये कविताएँ बालकों के मन की तरह सीधी‚ सरल‚ सहज और लयात्मक होती हैं जो ग्रीष्म का चित्र प्रस्तुत करती हैं—
कटते न लम्बे दिन काटे
जड़ती है गालों पर चाँटे
धरती पर दौड़ रही सरपट
गर्मी की धूप बड़ी नट–खट।
— — — —
फिर नभ से अंगारे बरसे
गर्मी के दिन आये हैं
मुश्किल हुआ निकलना घर से
गर्मी के दिन आये हैं ।
लम्बे–लम्बे ज्यों अजगर से
गर्मी के दिन आये हैं ।
—रामानुज त्रिपाठी

इसी प्रकार सूरज की भीषण गर्मी से व्याकुल एक बच्चा कितनी सहजता से अपनी स्वाभाविक भाषा में कह उठता है—
सूरज ने गर्मी फैलाई उइ दइया
काली पीली आँधी आई उइ दइया।।
सूरज की शक्ति का सही माने में आकलन ग्रीष्म में ही होता है‚ शीत ऋतु में तो बेचारा ठिठुरा‚ सिकुड़ा‚ प्रभाव हीन से नीलाकाश के कोने में दुबहा पड़ा रहता है।ग्रीष्म में वह नीलाकाश का सम्राट बन जाता है‚ उससे गर्मी कम करने की प्रार्थना कारने के सिवाय हम कर ही क्या सकते हैं।एक बच्चा गर्मी कम करने का निवेदन करते हुए कहता है—
सूरज दादा
सूरज दादा
थोड़ी गरमी कम कर दो
धरती जलने लगी तवे सी
थोड़ी गरमी कम कर दो
पशु–पक्षी हैं कितने व्याकुल
तुम तो स्वयं देखते हो
सूख गए हैं ताल–तलैया
थोड़ी गरमी कम कर दो
गरम–गरम लू दिन भर चलती
घर में कैद हो गए हम
मन करता है खेलूँ बाहर
थोड़ी गरमी कम कर दो

पिकनिक की जब बात करुँ
तो‚ मम्मी कहती‚ गरमी है
क्यों इतने नाराज हो गए
थोड़ी गरमी कम कर दो

क्या गलती हो गई? कि
दादाॐ ऐसे आँख दिखाते हो
कान पकड़ कर माँफी माँगू
थोड़ी गरमी कम कर दो
—डॉ0 जगदीश ‘व्योम’

ग्रीष्म ऋतु का सबसे गरम समय होता है जेठ का महीना।जेठ दोपहरी में लू चल रही है‚ मार्ग पर चलना मुश्किल हो रहा है‚ पैरों में फफोले पड़ जाते हैं।ऐसा लगता है मानों आग अपने गोले छोड़ रही हो‚ यही सब कुछ जेठ में हमें दिखाई देता है।तभी तो कवि कह उठता है—
जेठ तपी धरनी मरु सी अरु लूह चली करि बंजरु टोला
छोड़ती छाँव ठिया अपनी उत पाँजरि होय हरो तन चोला
बाढ़तु ताय तमोगुन सो अरु पाँव परें मग माँहि फफोला
व्याकुल होंय चरा चरह इत आगि छुड़ावति आपन गोला।।
—रघुवीर सिंह अरविन्द

गर्मी की भीषण उमस से व्याकुल ग्रमीण बच्चे नदी पौखरों में कुद–कूदकर नहाते हैं और गर्मी से इस तरह पीछा छुड़ाते हैं—
गर्मी से व्याकुल हुए घर से आकर तंग
दूर नदी में कूदते बच्चे नंग धड़ंग।।
—नित्यगोपाल कटारे

गर्मी के प्रभाव से वृक्ष भी झुलस से गए हैं और सूर्य की किरणें तप कर लाल हो गई हैं—
“प्यासे प्यासे से खड़े‚ रूखे सूखे रूख
जेठ मास के तरनि से‚ तापी मयूख मयूख।।”
—जगदीश प्रसाद सारस्वत ‘विकल’

गर्मी की धूप और कुछ करे या न करे उत्साह भंग तो कर ही देती है—
“चिलचिलाती धूप
हर लेती रूप
झुलसाती अंग–अंग
करती उत्साह भंग”
—भास्कर तैलंग

गर्मी में शरीर से पसीना बहता है और प्यास अधिक लगती है परन्तु प्यास भी है कि बुझने का नाम ही नहीं लेती है।एक दृश्य देखें—
देहों के दरवाजे खोल रहा स्वेद
प्यासों को देख तृप्ति लौटती सखेद।
—गिरिमोहन गुरु

कवि जब ग्रीष्म के तपते सूर्य को निरखता है तो उसका कारण अपने हिसाब से खोजता हैं‚ सूर्य के लाल होने के पीछे कुछ तो कारण होगा लेकिन इसका प्रभाव यह हुआ है कि सब व्याकुल हैं।हवा पानी से रहित हो गई है‚ नीम की छाया भी अब छाया खोजने लगी है‚ नदी का जल कम हो गया है‚ ताल सूख गए हैं—
जाने क्या हो गया‚ कि सूरज इतना लाल हुआ।
प्यासी हवा हाँफती फिर–फिर पानी खोज रही
सूखे कण्ठ–कोकिला‚ मीठी बानी खोज रही
नीम द्वार का‚ छाया खोजे पीपल गाछ तलाशे
नदी खोजती धार कूल कब से बैठे हैं प्यासे
पानी–पानी रटे
रात–दिन‚ ऐसा ताल हुआ
—डॉ0 जगदीश व्योम

यही नहीं कि हम गरमी से केवल परेशान ही होते हैं बल्कि यह हमारी स्मृति में गहरअई तक पैठ बना लेती है और जब हम अपने गाँव घर से दूर होते हैं तो यही गरमी की यादें रह–रहकर हमारे मन में आती हैं—
गरमी की महकती
सुबह को साँसों में भरना
खस से टपकता खुशबू भरा
वो पानी कहाँ है ।
—सुमन कुमार घेई

गरमी से बहुत जल्दी परेशान होने का एक कारण यह भी है कि हम प्रकृति से एकदम कट गए हैं—
मई की उमस में
अपने छोटे से कमरे की
खिड़की और दरवाजों को दिन भर
मजबूती से बन्द रखा मैंने
ताकि लू कि चपेट में ना आ जाऊँ ॐ
—अजित कुमार

ग्रीष्म कितनी भी कष्टदायक क्यों न हो पर हम अच्छी तरह जानते हैं कि ग्रीष्म के कारण ही पानी बरसता है और हरियाली लौटकर आती है—
यह सब कुछ याद रहे
मौसम का साथ रहे
ग्रीष्म ऋतु भी जाएगी
फिर रहेगी प्रतीक्षा
अगले मौसम की
बहार की।
—अश्विन गांधी

गरीब मजदूर गरमी से दूसरों को बचाने के ल्एि दोपहरी में भी काम करते हैं।काश हम उनकी ओर भी ध्यान दे पाते। उषा चौधरी एक ऐसे ही दृश्य का चित्रण करते हुए कहती हैं—
ज़रा सी खिड़की खोल कर देखा
नीम के पेड़ के नीचे
दुबला पतला
आबनूसी रंग वाला बच्चा
तपती धरती में
नंगा पड़ा रो रहा है।
और
मां बाप औरों को
गरमी से बचाने के लिये
ख़स के पर्दे गूंथ रहे हैं।
—उषा चौधरी

धूप का वृक्षों की टहनियों और पत्तियों के बीच से छन–छनकर धरती पर आना दृष्टि का उत्सव है।ग्रीष्म की धूप का ऐसा ही एक मनभावन चित्रण करते हुए पूर्णिमा वर्मन कहती हैं—
झर रही है
ताड़ की इन उंगलियों से धूप
करतलों की
छांह बैठा
दिन फटकता सूप
बन रहे हैं ग्रीष्म के स्तूप।
—पूर्णिमा वर्मन

धूप कितनी ही तेज क्यों न हो कोई काम नहीं रुकेगा‚ यही संसार का नियम है।लोग धूप में बाहर निकलेंगे भी और पाँव के छालों को भी सहलाएँगे—
तेज धूप में आना जाना लगा रहेगा
पैरों के छाले सहलाना लगा रहेगा।
—ज्ञानप्रकाश विवेक

गरमी का प्रभाव गरीब और अमीर दोनों के लिए अलग तरह का होता है। अमीरों के तो कुत्तों के लिए भी ग्रीष्म के आतप से बचाव के उपाय हो जाते हैं पर गरीब के लिए—
गरमी की दोपहरी में
तपे हुए नभ के नीचे
काली सड़कें तारकोल की
अंगारे सी जली पड़ी थीं
छांह जली थी पेड़ों की भी
पत्ते झुलस गए थे
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कड़ी धूप से।
बड़े घरों के श्वान पालतू
बाथरूम में पानी की हल्की ठंड़क में
नयन मूंद कर लेट गए थे।
कोई बाहर नहीं निकलता
सांझ समय तक
—शकुंत माथुर

ग्रीष्म का सुरेन्द्र सुकुमार ने बहुत ही जीवन्त चित्र खींचा है—
ज्यों ही आंगन में पड़े जेठ धूप के पांव।
कोठे भीतर घुस गयी छोटी दुल्हन छांव।।
बड़ी दूर सब हो गये पानी पनघट छांव।
झुलस गये हैं दूब के नन्हें नन्हें पांव।।
—सुरेन्द्र सुकुमार

ग्रीष्म का यह आतप थोड़े दिन के लिए ही सही परन्तु सभी जीव जन्तुओं के लिए घोर तपस्या का काल खण्ड होता है।कहते हैं कि ग्रीष्म जितनी ताप छोड़ेगी पावस उतनी ही हरियाली बिखरायेगी।

—डॉ0 जगदीश व्योम