Sunday, July 09, 2017

कवि घासीराम घसेरे और हिन्दी काव्य मंच

-डॉ0 जगदीश व्योम
जीवन में नियम और अनुशासन का पालन स्वाभाविक जीवन जीने के लिए आवश्यक है। अनुशासन हीनता और एक सीमा से अधिक अनुशासन का पालन दोनों ही जीवन की स्वाभाविक गति का संतुलन बिगाड़ देते हैं। कभी-कभी अत्यधिक उदारता भी गले की हड्डी बन जाती है। कहा भी गया है कि ‘अति सर्वत्र वर्जयेत’।
प्राचीन उज्जैन नगरी के सुप्रसिद्ध राजा भोज बहुत बड़े साहित्य प्रेमी थे और वे कवियों और साहित्यकारों का बड़ा आदर करते थे। वे स्वयं भी बहुत अच्छे कवि थे। उनके दरबार में कवियों का बहुत सम्मान होता था। कोई भी कवि उनके दरबार में कविता सुनाने जा सकता था। कविता सुनाने पर कवि को अच्छा-खासा पुरस्कार दिया जाता था।
दूर-दूर तक ख्याति फैल चुकी थी। एक से एक अच्छे कवि राजा भोज के दरबार में आते और अपनी कविता सुनाकर बहुत सारा धन पुरस्कार में प्राप्त करते। कभी-कभी ऐसे भी कवि दरबार में आ जाते जिनकी कविता में न भाव की सुन्दरता होती न भाषा की और न ही छन्द का निर्वाह होता फिर भी ऐसे तुक्कड़ कवि भी भरपूर ईनाम पाते और दो-चार दिन दरबार में मेहमान बनकर षटरस व्यंजनों का आनन्द लेते।
बात धीरे-धीरे राज्य के दूर-दराज के इलाकों में फैल गई कि कैसी भी कविता राजा भोज के दरबार में सुनाकर पुरस्कार ले आओ। पुरस्कार सबको मिलता है। जनता अकर्मण्य होने लगी। मजदूर मजदूरी करने के स्थान पर कविता गढ़ते और दिन भर मजदूरी करके जितना कमाते थे उस से कई गुना ज्यादा धन ले आते। किसान खेती करने की जगह कविता रचते। भिखारी भीख माँगने की जगह अब कविता सुनाकर अपना गुजारा करते। ‘सब धान बाइस पसेरी हो गए’ अच्छे साहित्यकार और कवि कविता के साथ हो रहे इस मखौल को सुन सुनकर बहुत दुखी थे परन्तु राजा से यह बात कौन कहे।
घासीराम घसेरे के दिन बड़ी तंगी में कट रहे थे। बेचारा दिन भर घास छीलता और शाम को मंडी में उसे बेचने से जो कुछ पैसे मिलते उसी से अपने परिवार के लिए आटा, दाल खरीदता। एक दिन जब वह बाजार में घास बेचकर अपनी झोंपड़ी में लौटा तो उसकी पत्नी के चेहरे पर कुछ अजीब सी चमक थी। घासीराम के लिए यह नई बात थी क्योंकि उसने तो विवाह के बाद पत्नी के चेहरे पर अब तक गुर्राहट ही देखी थी। घासीराम कुछ पूछता, इससे पहले ही पत्नी के मुँह से बात छलक कर बाहर आ गई-
“अइसे कब लौं घास छील्त रहिअउ?“ लोटे में ठंडा पानी देते हुए पत्नी ने कहा तो घासीराम उसकी ओर देखता रह गया।
“मैं तेरा मतलब नहीं समझा.......आखिर तू क्या कहना चाहती है?..........अरे भागवान! घसेरा घास नहीं छीलेगा तो और क्या करेगा.......कहीं राजपाट रखा है?...........या अलादीन का चिराग रखा है जिसे रगड़ दूँगा तो सोने-चाँदी का ढेर लग जाएगा....।“ घासीराम ने हँसते हुए कहा।
“अरे हमार दिमाक मइँ आजु एक अइसी जुगति आई हइ जाइ सुनिअउ तउ कहिअउ कि हाँ......“
“अच्छा ठीक है......तू बता............“
“राजा भोज के दरबार मइँ कविता सुनाइ आवौ औ इत्तो धनु लै आवउ कि सालुभरि गुजर होति रहिअइ“ पत्नी ने प्रस्ताव रखा।
“अरे तेरा दिमाग तो ठीक है?...........तू जानती भी है कि कविता क्या होती है?........अरे हम घसेरे कविता क्या जाने?.......पागल कहीं की......“
“ठीक हइ, हम पागलइ सही........हमारी बात मानन मइँ आखिर बुराई का हइ?.....................रमकन्ना इक्काबारो कल्लि गयो तो दरबार मइँ......कविता सुनाइ के आओ हइ, देखि अइयौ बाके घरइ..........इत्ते रुपिया लै आओ हइ दरबार सइ.......तुम का बाऊ तै गये बीते हउ?..........“ पत्नी ने दानों हाथों को समानान्तर करते हुए धन की मात्रा बतायी।
घासीराम अब निरुत्तर था। पत्नी ने तर्क ही ऐसा दिया था। उसके मन में बार-बार एक ही प्रश्न उठ रहा था कि “रमकन्ना और कविता......“
एक दिन घासीराम अपने तीन और घसेरे साथियों के साथ जंगल में घास छील रहा था। पत्नी की कही बात को उसने उसके सामने तो टाल दिया था लेकिन बात उसके मन में रह-रहकर गूँज रही थी।
चिलम में दम लगाते हुए घासीराम बोला- “भाइयो! राज भोज के दरबार में कविता सुनाओगे?“
“का कही भैया...? कविता और हम लोग...........घासी भैया, का आजु गाँजा पी के आये हउ का......?“ अन्य घसेरों ने घासीराम की ओर आश्चर्य से देखते हुए कहा।
“नहीं भाइयो!........गाँजा-आँजा नहीं.....मेरी बात ध्यान से सुनो........जब जैसी हवा बहती हो, उसी के अनुसार चलना चाहिये और मौके का फायदा उठाना चाहिये।......हमारा पड़ोसी ‘रमकन्ना’ कविता सुना सकता है तो हम सब क्यों नहीं......? चलो मेरे साथ......अगर हम लोग अलग-अलग कविता नहीं बना पाएँगे तो चारों मिलकर एक कविता तो बना ही डालेंगे.......“ -कहते हुए घासीराम ने खुरपी और चादर वहीं फेंकी और चल दिया दरबार की ओर।
घासीराम के तीनों साथी भी उसके संग हो लिए। चलते-चलते वे चारो सोच रहे थे कि आखिर कविता बनाई कैसे जाये? वे तो जानते ही नहीं थे कि आखिर कविता होती क्या है? बस कविता का नाम सुना था।
एक घसेरे के दिमाग में अचानक कुछ सूझा और वह फटाक से बोला- “अरे कविता बनाने में क्या है?.......जो कुछ दिखाई दे उसे कह डालो ......यही कविता हो जाएगी।“ चारांे घसेरे दरबार की ओर चलते चले जा रहे थे। उन्हें पूरा भरोसा था कि दरबार तक पहुँचते-पहुँचते कविता मिल ही जाएगी।
चलते-चलते वे चारों एक गाँव के पास पहुँचे जहाँ एक बूढ़ा व्यक्ति चरखा चला रहा था। चरखे से ‘मन्न मन्न......’ की ध्वनि आ रही थी। इसे सुनते ही एक घसेरा अचानक खुशी से चीख पड़ा- “मिल गई....मिल गई.......मेरी कविता तो मिल गई......।“ 
“क्या मिल गई.......अरे भाई सुना तो देखें तेरी कैसी कविता है?“ तीनों घसेरे उत्सुकता के साथ उससे पूछने लगे।
“भैया मेरी कविता है- ‘मन्न-मन्न रहँटा मन्नाइ.....।“ हाँ भाई तेरी कविता तो बन गई। अब हमारी बारी है.......चलो आगे ढ़ूँढ़ते हैं कही न कहीं तो आखिर मिलेगी ही।
थोड़ी दूर चले ही थे कि एक तेली तेल पेरने का कोल्हू चला रहा था। बैल चुपचाप चल रहा था और रौंछ भी कर रहा था। दूसरे घसेरे के दिमाग में बात कौंधी और वह चिल्लाया “भैया मेरी भी मिल गई....“
“हाँ सुना भैया, तेरी कविता कैसी है .......हम भी तो सुने....“ तीनों घसेरे एक साथ बोल पड़े।
“पहले तू अपनी सुना“ -पहले घसेरे से दूसरे ने कहा।
“मन्न-मन्न रहँटा मन्नाइ.....“
“तेली को बद्धा रौंछ कराइ......“
“हाँ भाई! तुम दोनों की कविता तो बन गई। चलो और खोजते हैं.....मिलेगी हमारी भी.....“ तीसरे और चौथे घसेरे ने पूरी आशा के साथ कहा और आगे के रास्ते पर चल दिये। 
थोड़ा सा आगे चले ही थे कि एक पेड़ के नीचे एक झोंपड़ी में एक आदमी बैठा हुआ चरखा कात रहा था मगर उसकी आँखें बन्द थीं। तीसरे घसेरे को लगा कि कविता यहाँ है। उसने भी थोड़ी देर के लिए आँखें बन्द कीं और मानों कविता की डोरी को अपने हाथ में पकड़ लिया......वह खुशी से चिल्लाया- “मेरी भी मिल गई......“
“हाँ, सुना भैया!“ तीनों ने खुश होकर कहा।
“पहले तुम दोनों सुनाओ...“ तीसरे ने कहा।
“मन्न-मन्न रहँटा मन्नाइ.....“
“तेली को बद्धा रौंछ कराइ......“
“चरखा कातत आँखें बन्द......“
अब केवल घासीराम रह गया था जिसकी कविता अब तक नहीं बन पाई थी। बार-बार वह कोशिश करता परन्तु कविता रूपी चिड़िया उसकी पकड़ में नहीं आ पा रही थी।
दरबार निकट आता जा रहा था। घासीराम को अपने ऊपर झुँझलाहट हो रही थी और गुस्सा भी आ रहा था। उसी ने तो इन तीनों को कविता सुनाने की बात बताई, इन्हें तैयार करके लाया और आखिरकार वही फिसड्डी रह गया।
जब उसे कविता नहीं मिली तो वह लगा राजा भोज के बारे में सोचने। उसके तीनों साथी तभी उससे बोले- “तुम चाहो तो वापस लौट जाओ..........हम तो दरबार में जरूर जायेंगे।“
घासीराम ने उनकी बात का उŸार नहीं दिया और वह राजा और राजा के द्वारा दिये जाने वाले पुरस्कार के बारे में सोचने लगा। वह सोचने लगा-
“राजा भोज भी कैसे मूर्ख हैं......अरे हम घास छीलने वाले लोग कविता क्या जाने.......ये बेकार की बातों को कविता मानकर जो राजा इतना धन बाँटता रहता है, मेरी समझ में तो ऐसा राजा मूर्ख है।“ यह सोचते हुए वह लौट ही रहा था कि उसके दिमाग में कुछ कौंधा........वह पलटकर चिल्लाया- 
“अरे, मुझे भी मिल गई......।“
अब चारों खुश थे।
“हाँ घासी भैया! सुनाओ तो अपनी कविता.....“ कहकर तीनों ने अपनी-अपनी कविता की लाइने सुनाईं-
“मन्न-मन्न रहँटा मन्नाइ.............“
“तेली को बद्धा रौंछ कराइ......“
“चरखा कातत आँखें बन्द..........“
“भोजराज तुम मूसरचन्द............“
चारों घसेरे अब कवि हो चुके थे। उनकी चाल में भी अब फर्क आ गया था। आखिरकार दरबार में कविता सुनाने के लिए जा रहे थे।
जैसे ही मुख्य द्वार पर पहुँचे कि उनकी फटी-फटाई वेशभूषा देख कर द्वारपाल ने उन्हें द्वार पर ही रोक लिया और दरबार में आने का प्रयोजन पूछा।
“हम कवि हैं......और महाराज के दरबार में कविता सुनाने आये हैं“  
“अच्छा......!.......ठीक है......पहले सुनाओ तो........देखें तो कि तुम्हारी कविता दरबार में सुनाने लायक है भी कि नहीं!“ चारों घसेरे एक दूसरे का मुँह ताकने लगे और कविता सुनाने के लिए अपने को तैयार करने लगे।
पहले ने अपनी कविता सुनाई- “मन्न मन्न रहँटा मन्नाइ।”
दूसरे ने अपनी पंक्तियाँ जोड़ीं- “तेली को बद्धा रौंछ कराइ।”
तीसरे कवि ने कविता सुनाई -  “चरखा कातत आँखें बन्द।”
चौथे ने अपनी कविता सुनाई-  “भोजराज तुम मूसरचन्द।”
जैसे ही चौथे घसेरे कवि ने अपनी कविता पढ़ी तो द्वारपाल के माथे पर बल पड़ गए। वह सोचने लगा कि इसकी कविता तो महाराज के नाम की खिल्ली उड़ाने वाली है।
द्वारपाल कुछ देर तक सोचता रहा फिर बोला- “तुम तीनों कवि दरबार में कविता सुनाने के लिए जा सकते हो।”
“और मैं...........मेरा क्या होगा?” चौथे कवि ने गिड़गिड़ाते हुए निवेदन किया।
“नहीं भाई! तुम नहीं जा सकते........तुम्हारी कविता ठीक नहीं है।”
चौथा घसेरा बहुत दुखी हो गया। वह द्वारपाल के हाथ-पाँव जोड़ने लगा कि किसी तरह से वह उसे भी दरबार में पहुँचा दे और कविता सुनाने का मौका दिलवा दे।
द्वारपाल ने उसकी कविता में सुधार करने की दृष्टि से कुछ देर सोचा फिर वह बोला कि तुम अपनी कविता की जगह यह पढ़ना- 
“हरि के बिना सब बेकार छन्द।”
अब चारों घसेरे खुश थे कि दरबार में अपनी-अपनी कविता सुना सकेंगे और ईनाम पाएँगे।
चारों ने एक बार फिर अपनी-अपनी पंक्तियाँ जोड़ीं-
“मन्न-मन्न रहँटा मन्नाइ..........................“
“तेली को बद्धा रौंछ कराइ...................“
“चरखा कातत आँखें बन्द........................“
“हरि के बिना सब बेकार छन्द...............“
दरबार में पहुँचकर चारों ने राजा भोजराज को सिर झुकाकर प्रणाम किया। राजा ने आदर देते हुए उन्हें आसन दिया और अपनी-अपनी कविता सुनाने के लिए कहा-
चारों कवियों ने अपनी-अपनी कविता प्रस्तुत की-
“मन्न-मन्न रहँटा मन्नाइ..........................“
“तेली को बद्धा रौंछ कराइ...................“
“चरखा कातत आँखें बन्द........................“
“हरि के बिना सब बेकार छन्द...............“
महाराज बड़े ध्यान से कविताएँ सुन रहे थे। जैसे ही चौथे कवि ने अपनी कविता सुनाई तो उनके मन में विचार आया कि ये चारों एक ही मानसिक स्तर के हैं। इनकी कविता भी एक ही स्तर की होनी चाहिये परन्तु पहले तीन का स्तर तो ठीक है परन्तु चौथा कुछ अलग-अलग लग रहा है....अवश्य ही दाल में कुछ काला है, राजा भोजराज ने पलभर सोचा और फिर निर्देश दिया- “पहले तीन कवियांे को पुरस्कार दिया जाय और चूँकि चौथे कवि की कविता अच्छी नहीं है इसलिए इन्हें कुछ भी नहीं दिया जाएगा।“
बेचारा घासीराम बहुत दुखी हो गया। वह समझ रहा था कि इन तीनों से अधिक ईनाम उसे ही मिलेगा क्योंकि उसकी कविता द्वारपाल ने बनवाई है। राजा का निर्णय सुनकर हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाने लगा-
“महाराज!.........मेरी असली कविता ये नहीं है..........ये तो द्वारपाल ने बनवा दी थी........मेरी अपनी कविता तो दूसरी थी।“
“तुम अपनी कविता सुनाओ“ महाराज ने निर्देश देते हुए कहा।
“नहीं महाराज!.......मैं वह कविता आपको नहीं सुना सकता.......वह अच्छी नहीं है.........सुनकर आप नाराज भी हो सकते हैं।“ घासीराम घसेरे ने गिड़िगिड़ाते हुए विनती की।
“हम नाराज नहीं होंगे.......तुम अपनी कविता सुनाओ.......हम तो कवियों का सम्मान करते हैं.......मगर उनका ही जो अपनी कविता सुनाते हैं, दूसरों की नहीं.....इसलिए तुम अपनी कविता सुनाओ।“ राजा भोजराज ने पुनः कहा।
“महाराज हम चारों तो घसेरे हैं, ऐसे ही मन में विचार आया कि जब आप कविता के नाम पर कुछ भी सुना देने से पुरस्कार दे देते हैं तो फिर और कोई काम करने की क्या जरूरत है?.......यही सोच कर हम चारों यह कर बैठे और चारों ने एक साथ कविता बना ली।......इन तीन की तो बन गई थी पर मेरी कविता बन ही नहीं रही थी इसलिए........“ 
“इसलिए क्या?“ महाराज ने प्रश्न किया।
“महाराज !.......इसलिए मेरे मन में यह विचार आया कि जो राजा किसी भी तरह की कविता पर पुरस्कार दे देता है, यह नहीं देखता कि वह कविता है या बकवास? तो फिर........तो फिर ऐसा राजा भला बुद्धिमान कैसे हो सकता है?............हम जैसे घसेरे भी अपना काम छोड़छाड़ कर कविता के नाम पर खेल करें और पुरस्कार पाने लगें तो फिर राज्य का भविष्य भला क्या होगा?.........और जो इतना भी नहीं जानता है वह हमारे लोक समाज में ‘मूसरचन्द’ ही कहलाता है, यही सोचकर हमने तुकबंदी करने का अपराध कर डाला।“ घासीराम बेचारा परेशान हो रहा था।
“अच्छा ठीक है, तुम चारों एक साथ अपनी कविता सुनाओ“ महाराज ने कहा।
मन्न-मन्न रहँटा मन्नाइ..........................
तेली को बद्धा रौंछ कराइ...................
चरखा कातत आँखें बन्द........................
भोजराज तुम मूसरचन्द ........................
“ठीक है तुमने अपने मन की बात ही कविता में कही......वास्तव में तुम कविता की आत्मा को पहचानते हो..........तुम ने हमें एक नई दृष्टि भी दी है। भले ही तुमसे यह अनजाने मंे हुआ हो परन्तु तुमने साहस करके असलियत को तो सामने रख ही दिया है।” कहते हुए राज भोजराज ने बहुत सा ईनाम देकर घासीराम घसेरे को उसके तीनों साथियों के साथ विदा किया।
राजा भोज विचार करने लगे कि इस घसेरे कवि ने कितनी सही बात कही है, यदि योग्य और अयोग्य सब को सम्मानित किया जाता रहेगा तो योग्यता कुंठित हो जाएगी, कविता की ऐसी तैसी हो जाएगी और ऐसे ही घसेरे-लुटेरे, चोर-उचक्के, नचकैया-गवैया सब कवि बनकर कविता के नाम पर बकवास करना शुरू कर देंगे। चुटकुलों को कविता का नाम देकर मंचों पर सुनाते फिरेंगे। अश्लील शब्दों का प्रयोग करेंगे और गालियाँ देंगे.....परिणाम यह होगा कि साहित्य प्रेमी जन कविता से बिदकने लगेंगे तथा काव्यमंचों की जड़ ही ऐसे लोग खोदकर फेंक देंगे।.....इसलिए कविसम्मेलन के आयोजक की ही पूरी जिम्मेदारी होनी चाहिये कि वह ऐसी भड़ैंती करने वालों को कवि मंचों पर न चढ़ने दे और कविता की अर्थी निकालने के आयोजन न करे।..........मैं अब ऐसा नहीं करूँगा......इस घसेरे ने मेरी आँखें खोल दी हैं।
वर्तमान हिन्दी काव्यमंचों के व्यवस्थापक और संयोजक राजा भोज की इसी मानसिकता का अनुकरण कर रहे हैं। ऐसे कवि मंचों पर कविता बाँच रहे हैं जिन्हें वास्तव में कविता की बारहखड़ी तक नहीं आती है। अच्छे कवि आज मंचों पर आने से कतराने लगे हैं क्यों ऐसे ही घसियारे कवियों ने श्रोताओं का स्वाद बिगाड़ कर रख दिया है। एक कवि सम्मेलन में एक कवि ने कविता पढ़ी-
                         न मैं चाचा का हूँ, न भतीजा हूँ
मैं अपने बाप की गलतियों का नतीजा हूँ।।
क्या कहना चाहता है आज का यह मंचीय कवि?...........और क्या शिक्षा देना चाहता है जनता को? कविता का एक अनुशासन है, दन्द है, व्याकरण है, शिल्प और कथ्य की सुघड़ता है और है शब्दों का कलात्मक प्रयोग। लेकिन आज का काव्यमंच राज भोज का उदारवादी दरबार बन गया है जहाँ आम-घास जो चाहो सुनाओ और कवि कहलाओ।......राजा भोज तो संवेदनशील थे ‘भोजराज तुम मूसरचन्द’ सुनकर सँभल गए। पर आज के संयोजकों और व्यवस्थापकों को कौन समझाये कि तुम सबने कविता की ऐसी-तैसी खूब कर ली अब इसे अपने हाल पर छोड़ दो। 
-डॉ० जगदीश व्योम
बी-12ए / 58 ए
सेक्टर-34, नोएडा 
पिन कोड-201301



Saturday, December 31, 2016

हाइकु कविताओं में नया साल

                                  हाइकु कविताओं में नया साल

                                                                                   -डा॰ जगदीश व्योम

लो फिर आ गया नया साल, निरन्तरता का सूचक है नया साल । कुछ भी स्थिर नहीं है समूची सृष्टि में । सब चल रहे हैं, और निरन्तर चलते जा रहे हैं, कहाँ जा रहे हैं... किसी को कुछ पता नहीं। हम धरती पर चल रहे हैं, धरती अपने रास्ते पर चल रही है, जाने कब से लगाये जा रही है सूर्य के आस-पास चक्कर पर चक्कर, सूर्य महाराज किसी और की परिक्रमा किये जा रहे हैं। धरती ने अपना एक चक्कर पूरा किया कि हम मग्न हो गए कि लो नया साल आ गया।
उधर काल पुरुष किसी अलौकिक ग्रंथ के पृष्ठ दर पृष्ठ खोलता चला जा रहा है। एक पन्ना खुलता है बहुत हौले से जिसमें अंकित है एक नवगीत पूरी तीन सौ पैंसठ पंक्तियों का जिसे उकेरा है किसी अज्ञात रचनाकार ने । काल पुरुष इसे पढ़कर पलट देता है एक और नया पन्ना, न जाने कब से चल रहा है यह क्रम -
  लो चला वर्ष
नया पृष्ठ खोलेगा
काल पुरुष  
-शिवजी श्रीवास्तव
सबकी निगाहें प्रतीक्षारत हैं कि-
चीर के धुंध
आएगा नव वर्ष
उल्लास भरा  
-राजीव गोयल
पूरे हुये प्रतीक्षा के ये पल, आ गई उभर कर एक किरन और साथ में खींचकर ले आई नये साल का भारी भरकम ठेला-
साल का ठेला
खींचकर लाई है
नई किरन
-पूर्णिमा वर्मन
किरन केवल साल का ठेला ही खींचकर नहीं लायी है, वह नये संकल्पों की गठरी भी लायी है अपने साथ-
नव संकल्प
सूर्य किरन लाई
धरा मुस्कायी
-सीमा स्मृति
संकल्पों को पूरा करना है तो सोते से जागना भी होगा तभी संकल्प पूरे हो सकेंगे। धरती ने नये साल के रूप में फिर से अँगड़ाई ले ली है, और अब बारी हमारी है कि हम भी आलस को त्याग कर सजग हो जायें अपने कर्तव्य पालन के लिये-
नये साल ने
ले ली है अँगड़ाई
कली मुस्कायी
-ऋता शेखर मधु
और जब-जब धरती अँगड़ाई लेती है तब-तब नई सृष्टि का संचार होता है, आशाओं के अंकुर फूट पड़ते हैं-
अंकुर फूटा
नई आशाएँ लिये
शुभ स्वागत
-भावना सक्सेना
इन नवांकुरों का स्वागत करना है, इन्हें पल्लवित होने के लिए स्वस्थ परिवेश देना है तभी ये नवांकुर पल्लवित और पुष्पित हो सकेंगे। नित नवीनता के प्रति आकर्षण हमारी जन्मजात विशेषता है। कविता में भी नवीनता खोजने की ललक हमेशा से रही है, नयी काव्य विधाओं के रूप में, छन्द के रूप में, कथ्य के रूप में। इसी खोज का सुपरिणाम है दुनिया की सबसे छोटी कविता- हाइकु । हाइकु कविताओं में नये वर्ष की चर्चा होती रही है। इस नव वर्ष के बहाने भी कवि छन्दों में कुछ नया-सा, कुछ मीठा-सा रस घोल सकें ऐसी ही कामना अपने एक हाइकु में शिवजी श्रीवास्तव करते हुए कहते हैं-
नया बरस
छन्दों में घोलें कवि
मीठा रस
-शिवजी श्रीवास्तव
नये वर्ष में कुछ नया हो जो प्रासंगिक हो, ऐसे विचार जो उपयोगी नहीं रह गये हों उन्हें छोड़ देने में ही भलाई है-
नूतन वर्ष
तज जीर्ण विचार
अबकी बार
-ज्योतिर्मयी पन्त
भारतीय संस्कृति की एक विशेषता यह भी है कि यहाँ केवल अपने सुख के लिये प्रार्थना नहीं की जाती है यहाँ तो सबके सुखी जीवन के लिये दुआ माँगी जाती है-
नवीन वर्ष
सबके जीवन में
लाए उत्कर्ष
-प्रदीप कुमार दाश
 नये वर्ष का मानवीकरण भी खूब किया है कवियों ने, कभी उसे राजा कहा है तो कभी सन्त और कभी ऐसा पाहुन जो बार-बार आता रहता है-
पाहुन बन
घूम-घूम के आया
नवल वर्ष
-रमा द्विवेदी
कहते हैं कि वक्त न तो छोटा होता है और न बड़ा, हम अपनी मनःस्थिति के अनुरूप उसकी अनुभूति करते हैं, दुखी व्यक्ति के लिए साल इतना लम्बा हो जाता है कि काटे नहीं कटता और जिनके जीवन में सुख है उनके लिए साल के तीन सौं पैंसठ दिन कब फिसल जाते हैं पता ही नहीं चलता एकदम हथेली में थामे हुए रेत के समान-
फिसल गया
वक्त की हथेली से
रेत-सा साल
-नमिता राकेश
कभी लगता है कि नया साल चुपचाप नहीं आता उसके आने पर शोर होता है ठीक किसी पहाड़ी झरने के समान-
नव वर्ष भी
झरने-सा उतरा
शोर मचाता
-डॉ. सरस्वती माथुर
नये वर्ष में जन-जन के मन में नये-नये सपने जन्म लेते हैं-
स्वप्न धवल
ख्यालों-मुंडेरों सजे
वर्ष नवल
-विभा श्रीवास्तव
नववर्ष का पहला दिन किसी पवित्र ग्रंथ के पहले पृष्ठ के समान लगता है, निर्मल और पावन, हरदीप कौर सन्धु इस प्रथम पृष्ठ को धीरे से खोलने का आह्वान करते हुए कहती हैं-
  धीरे से खोलें
आओ नव वर्ष का
प्रथम पृष्ठ
-डॉ. हरदीप कौर सन्धु
नववर्ष के पृष्ठ को खोलने के बाद संकल्प लेना है कुछ वादों का कुछ इरादों का-
कुछ वादे हैं
बहुत इरादे हैं
नव वर्ष में
-प्रियंका गुप्ता
इन वादों और इरादों को जब हम पूरा कर लेते हैं तब खिलती है इरादों की धूप और फिर नये साल के रूप में उम्मीदों की यही धूप कुछ और संकल्पों की चाह लिये आ जाती है-
फिर से खिली
उम्मीदों वाली धूप
नए साल की
- जेन्नी शबनम
हर एक नया साल एक न एक दिन पुराना हो जाता है और उसके पास कुछ शेष बचता है तो वह है तमाम पुरानी यादें-
पुरानी यादें
पोटली में बांधता
साल पुराना
-अंजली शर्मा
ये पुरानी यादें कभी-कभी ऐसी विभीषिकाओं और आपदाओं को समेटे हुए होती हैं कि दिन जख्मी लगने लगते हैं और तारीखें लाल-
जख्मी से दिन
तारीखें हुयी लाल
साल का हाल
-सविता अशोक अग्रवाल
दुख और आपदाओं को सौगात में देकर जाने वाला साल नये वर्ष में कुछ अच्छा होने का वादा करके विदा होता है शायद यह दुख और त्रासदी उसे भी अच्छी नहीं लगती होगी तभी तो पुराने साल की रात दूब पर ओस के रूप में अपने आँसू टपका कर यही संकेत करती है पूर्णिमा वर्मन के इस हाइकु में इसे महसूस किया जा सकता है-
पुराना साल
रात ने किया विदा
दूब पे अश्रु
-पूर्णिमा वर्मन
कभी-कभी लगता है कि साल किसी बटोही के समान है जो एक पड़ाव पर रुकता है और जाते समय अपनी यादों की पोटली वहीं छोड़ कर चल देता है, यह बात अलग है कि यादों की ये पोटली सभी को अपनी-सी ही लगती है-
बटोही साल
छोड़ गया पोटली
यादों से भरी
-सुनीता अग्रवाल
भले ही जाने वाला हर साल दुख और संत्रास की पोटलियाँ छोड़ता रहता है फिर भी हर किसी को किसी अचीन्हें उल्लास की उम्मीद बनी ही रहती है, यही लगता रहता है दुख और त्रासदी के धुंध को चीर कर नव वर्ष की किरणें सबके जीवन में उल्लास भर देंगीं-
चीर के धुंध
आयेगा नव वर्ष
उल्लास भरा
-राजीव गोयल
नये साल के हाथों में बारह महीनों का बूढ़ा कलेण्डर सौंप कर पुराना साल विदा हो जाता है, उमेश मौर्य के हाइकु में यही भाव देखा जा सकता है-
सौंपता चला
बूढ़ा सा कलेण्डर
नूतन वर्ष
-उमेश मौर्य
एक पीढ़ी अपनी विरासत दूसरी पीढ़ी को सौंप कर विदा लेती है इसी तरह पुराना वर्ष भी अपनी खट्टी-मीठी विरासत को आने वाले नये साल को सौंप कर स्वयं अतीत बन जाता है, योगेन्द्र वर्मा के इस हाइकु में यही संदेश है-
साल पुराना
सौंपता विरासत
नये साल को
-योगेन्द्र वर्मा
वक्त का डाकिया मधु पत्र के रूप में नये वर्ष को लेकर आता है तो चारो ओर खुशी छा जाती है-
काल डाकिया
ले आया मधु पत्र
नये वर्ष का
-शिवजी श्रीवास्तव
आने वाले वर्ष के दिन, महीने कैसे होंगे इसका ताना-बाना पहले से ही काल रूपी जुलाहा बुनकर तैयार कर लेता है-
काल जुलाहा
बुनता ताना-बाना
नवल वर्ष
-ज्योतिर्मयी पन्त
वक्त के जुलाहे ने आने वाले वर्ष के ताने-बाने में क्या बुना है यह तो किसी को नहीं मालूम परन्तु उम्मीद यही रहती है कि सब कुछ अच्छा रहे, हमारा देश खुशहाल रहे, जन-जीवन सुखी रहे, चारो ओर सुख और शांति बनी रहे-
नूतन वर्ष
खुशहाल वतन
सौगात मिले
-शांति पुरोहित
संघर्ष हमारे जीवन का अभिन्न अंग है, बिना संघर्ष के आगे बढ़ना असम्भव है, नये साल में हर संघर्ष पर हमारी विजय होती रहे, सबके लिये ऐसी ही कामना करना एक रचनाकार का धर्म बन जाता है, अरुण आशरी के एक हाइकु में इसे देखा जा सकता है-
नूतन वर्ष
जीतें हर संघर्ष
मिले उत्कर्ष
-अरुण आशरी
सपने देखना और सपनों को साकार करने का प्रयास करना ही जीवन का दूसरा नाम है, नया वर्ष भी जन-जन के मन में अनगिनत सपनों का संचार करता है, सबको सिंदूरी सपने बाँट कर उन्हें साकार करने की मूक प्रेरणा भी देता है, त्रिलोक सिंह ठकुरेला के इस हाइकु में यही भाव दृष्टव्य है-
नये वर्ष में
बाँट दिये सबको
सिन्दूरी स्वप्न
-त्रिलोक सिंह ठकुरेला
दुख के बाद सुख और सुख के बाद दुख का क्रम चलता ही रहता है, बीते साल में होने वाली घटनाओं से दुखी होकर रात दिन रोते रहने से अच्छा है कि खुशियों की परिकल्पना करते हुये जीवन में हर्ष और उल्लास की आशा रखनी चाहिये, नये साल में निश्चय ही सब कुछ अच्छा ही अच्छा होगा हमें यही सकारात्मक सोच रखनी चाहिये-
गम न कर
गुज़रा बीता साल
आएगी ख़ुशी
-गुंजन गर्ग अग्रवाल
और दुख, कुण्ठा, संत्रास का यह कुहासा जो जन-जन के मन पर अप्रत्याशित रूप से छाया हुआ है, वह नये साल में दूर होगा और नये साल के नये सूर्य की नयी किरणें इस कुहासे को चीर कर सुख और शांति की नयी और ताजी धूप जन-जन को समान रूप से बाँट कर इस कुहासे को दूर कर सकेंगी यही कामना है-
कुछ कम हो
शायद ये कुहासा
यही प्रत्याशा
-डा॰ जगदीश व्योम

जापान के अठारहवीं शताब्दी के अद्भुत हाइकु कवि कोबायाशी इस्सा के हाइकु जापान के साहित्यिक इतिहास मे कुछ वैसा ही मुकाम रखते हैं जैसा हिंदुस्तान मे कबीर की साखियों का है। हाइकु के चार स्तंभों मे ’बाशो’, ’बुसोन’ और ’शिकि’ के साथ ही उनका नाम भी शामिल है। अपने जीवन काल मे कोई 20000 हाइकु लिखने वाले इस्सा की लोकप्रियता वक्त से संग बढ़ती ही गयी है। कोबायाशी इस्सा (1763-1827) का 64 साल का जीवन लगातार उथलपुथल से भरा रहा। नये साल पर इस्सा के कुछ हाइकु उनके जीवन की इसी उथल-पुथल का आईना हैं-
साल का पहला सपना
मेरे गाँव का घर
आँसुओं से धुला
-इस्सा

वक्त के आगे मानव जीवन असहाय है, इस्सा बीते वर्ष की अनुभूति को एक हाइकु में व्यक्त करते हुए कहते हैं-
लकड़ी उतराती पानी में
कभी इधर कभी उधर
खतम होता है साल
-इस्सा

गढ़ रही है
साल का पहला आकाश
चाय की भाप
-इस्सा
चाय यहाँ नये साल के उत्सव का भी एक पहलू है। एक मजेदार बात यह भी है कि कवि के तखल्लुस ’इस्सा’ का जापानी मतलब भी चाय-का-कप जैसा कुछ होता है।
शहरी गरीब इलाकों मे रहने की जगह की तंगी अपने हिस्से की जमीन ही नही आसमान को भी छोटा कर देती है, इस्सा को इसका अच्छा तजुर्बा रहा था-
बाड़ से बँधा
कुल तीन हाथ चौड़ा
साल का पहला आकाश
-इस्सा
साल के पहले दिन सूर्य को देखकर इस्सा कहते हैं-
गोदाम के पिछवाड़े
तिरछा चमकता है
साल का पहला सूरज
-इस्सा
अपने घर की दुर्दशा के बहाने इस्सा अपनी आर्थिक खस्ताहाली पर भी व्यंग्य करने से नहीं चूकते हैं-
थोक मे अभिनंदन करता
साल की पहली बारिश का
टपकता हुआ घर
-इस्सा
इस्सा के तीखे हास्यबोध और जिंदगी के प्रति फ़क्कडपन का बेहतरीन उदाहरण है, जहाँ टूटे घर में भी वे ऐसी सकारात्मकता खोज लेते हैं कि जिंदगी से कोई शिकायत न हो-
दीवार मे छेद
कितना सुंदर तो है
मेरे साल का पहला आकाश
-इस्सा

-डा० जगदीश व्योम
बी-12ए / 58ए
धवलगिरि, सेक्टर-34
नोएडा - 201301






Tuesday, May 15, 2012

मुक्तछन्द या छन्दमुक्त

-डा० जगदीश व्योम 

हिन्दी साहित्य में "मुक्तछन्द" महाप्राण निराला की देन है। कविता में छन्द का बड़ा महत्व है। छन्द का आशय है अनुशासन अर्थात कविता में अनुशासन हो वही कविता कविता है। जिस कविता में छन्द नहीं हो अर्थात कोई अनुशासन नहीं हो उसे कविता नहीं कहा जा सकता, गद्य कह सकते हैं उसे। लेकिन एक समय हिन्दी साहित्य में ऐसा भी आया जब कविता में छन्द पर इतना अधिक ध्यान दिया जाने लगा कि कविता में छन्द तो रहा पर कविता गायब सी होने लगी। निराला जी ने तब "मुक्तछन्द" की घोषणा की अर्थात कविता को पारम्परिक छन्दों के बंधन से मुक्ति दिलाई। "छन्दमुक्त" शब्द हिन्दी कविता के लिए नहीं आया है, यह किसी भ्रम के कारण प्रयुक्त होने लगा, सही शब्द "मुक्तछन्द" है।
अर्थात कविता को किसी छन्द विशेष में ही नहीं लिखना है बल्कि आप अपने अनुरूप छन्द में कविता लिख सकते हैं पर उसमें कोई लय, प्रवाह अवश्य रहे। यदि लय और प्रवाह या अन्तवर्ती लय कविता में नहीं है तो उसे कविता नहीं कह सकते। निराला जी की किसी भी कविता में लय और प्रवाह देखा जा सकता है। जैसे, निराला जी की एक कविता है--

वह आता
दो टूक कलेजे कस करता
पछताता पथ पर आता
पेट पीठ दोनों मिलकर हैं एक
चल रहा लकुटिया टेक
मुट्ठी भर दाने को
भूख मिटाने को
मुँह, फटी पुरानी झोली का फैलाता
दो टूक कलेजे के करता
पछताता पथ पर आता
-(सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला)

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शशिकान्त गीते --

मेरी जानकारी में मूलरूप से मुक्तछंद में एक छांदसिक लय होती है मगर वह पारम्परिक छंद नहीं होता. यह लय बाह्य भी होती है. इसके विपरीत मुक्तछंद विचार या अर्थ की अंतर्वर्ती लय पर केन्द्रित होता है. कह नहीं सकता मेरी यह जानकारी सही भी है या नहीं.

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अमिताभ त्रिपाठी---

 डा० व्योम जी,  आपने चर्चा छेड़ी है तो मुझे भी कुछ कहने का मन हुआ। प्रायः लोग मुक्तछन्द और छन्द मुक्त को एक ही समझ लेते हैं। मेरे मित्रों के बीच भी इस विषय पर चर्चा हुई है। मुक्तछन्द की परम्परा में पहला नाम निराला का आता है और यदि मैं भूल नहीं कर रहा हूँ तो उन्होंने ही इस शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग किया है। "लिखता अबाध गति मुक्त-छन्द, पर सम्पादकगण निरानन्द...." (सरोज स्मृति)। ध्यान देने योग्य है कि विशेषण-विशेष्य की दृष्टि से भी देखें तो मुक्त-छन्द में भी छान्दसिकता संलिप्त है लेकिन इसकी प्रकृति मुक्त है। सम्भवतः यह मुक्ति तत्कालीन शास्त्रीयता से रही होगी। उस पुरातनपन्थी अवधारणा से जिसमें कुछ निश्चित छ्न्दों (मीटर्स) में ही रचना करने को कवित्व माना जाता था। उस जड़ता को तोड़ने के लिये मुक्तछन्द का आविष्कार या विधान हुआ। किन्तु क्योंकि छन्द एक प्रकार का शब्दानुशासन या लयानुशासन है इसलिये मुक्तछन्द कविताओं में भी वह अनुशासन बना रहता है। निराला की प्रभूत रचनायें इसका उदाहरण हैं।
अब कब और किस सुविधा के अन्तर्गत मुक्तछन्द उलट कर छन्दमुक्त हो गया यह शोध का विषय नहीं रहा। क्योंकि नई कविता के बाद अकविता का भी आन्दोलन चला और ऐसे पूर्वाग्रह भी देखने को मिले जो स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होने वाले अनुप्रासों को भी सायास तोड़ देते थे कि कहीं इससे कविता? में छन्द की गन्ध न आ जाय।
अस्तु छन्दमुक्त सृजन मेरी दृष्टि में एक अनुशासनहीन रचना प्रक्रिया है जिसमें गद्य को छद्मरूप से कविता का आकार दिया जाता है। विचारवान लोग इसे वैचारिक कविता कहते हैं जिससे ऐसा लगता है शेष रचनायें विचारहीन या अवैचारिक होती हैं।
यह सत्य है कि का्व्य को परिभाषित करना अत्यंत कठिन है लेकिन उसका अभास पाना उतना कठिन नहीं है। गद्य में भी काव्य रचना हो सकती है। आचार्य चतुरसेन का गद्यकाव्य दृष्टव्य है। अतः मुक्तछन्द गद्यकाव्य का ही एक छद्मनाम है मेरे मत से। परन्तु संकोच के साथ लिखना पड़ रहा है कि छ्न्दमुक्त रचनाओं में काव्य के भी दर्शन दुर्लभ होते जा रहे हैं, चुट्कुलों को छोड़ कर जिसे हास्यरस के कारण काव्य की प्रतिष्ठा मिल जाती है।
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